
मखाना की खेती मुख्य रूप से पानी की घास के रूप में होती है. इसको कुरूपा अखरोट भी कहा जाता है. मखाना की लगभग 88 प्रतिशत खेती अकेले बिहार में की जाती है. मखाना पोषक तत्वों से भरपूर एक जलीय उत्पाद है. जिसके अंदर प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट काफी मात्रा में मिलते हैं. जो मनुष्य के लिए लाभदायक होते हैं. इसका इस्तेमाल खाने में लोग मिठाई, नमकीन और खीर बनाने में लेते हैं. इसके अलावा दूध में भिगोकर इसे छोटे बच्चों को खिलाया जाता है. इसकी खेती के लिए जल भराव वाली भूमि की जरूरत होती है. भारत में इसकी खेती गर्म और शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में की जा सकती है. इसके पौधे पर कांटेदार पत्ते आते हैं. और इन्ही कांटेदार पत्तों पर बीज बनते है. इसके पत्तों से बीज निकलने के बाद वो तालाब की सतह में चले जाते हैं. जिन्हें पानी से निकालकर एकत्रित किया जाता है. वर्तमान में इसकी खेती छत्तीसगढ़ में भी की जा रही है. लेकिन इसकी खेती करने वाले किसान भाइयों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इसके फल समय पर प्राप्त नही होने और सतह में चले जाने से लगभग 25 प्रतिशत फल खराब हो जाता है.
संभावनाएं
■छत्तीसगढ़ में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए आय में दुगुनी वृद्धि हेतु मखाना एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
■औशधि गुणों से भरपूर आंगन बाड़ी के माध्यम से महिलाओं एवं बच्चो के कुपोषण दूर करने में एक बेहतर विकल्प हो सकता है।
■कोरोना काल मे super food मखाना की विश्व स्तर में मांग बढ़ी है।
छत्तीसगढ़ में हो रही है मखाना की खेती
ग्राम लिंगाडीह ब्लॉक आरंग जिला रायपुर में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर मखाना की खेती 30 एकड़ में कर रहे है। डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर छत्तीसगढ़ में इतने बड़े स्तर पर मखाना की खेती करने वाले पहले कृषक है।
डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर बताते है कि वे मखाना का प्रसंस्करण कर छत्तीसगढ़ की जनता को मखाना उपलब्ध कराना चाहते है जिसकी तैयारी भी लगभग पूर्ण हो चुकी है। उन्होंने इसकी पैकेजिंग कराकर अपने पिताजी स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चन्द्राकर “दाऊ जी” के नाम पर ही मखाना का ब्रांड नेम दिया है जो कि काफी आकर्षक है।

उपयुक्त वातावरण

मखाने की खेती के लिए जल भराव वाली काली चिकनी भूमि उपयुक्त होती है. क्योंकि इसके पौधे पानी के अंदर ही उगते हैं. इसके लिए जलभराव वाली जमीनों में मिट्टी खोदकर तालाब बनाये जाते हैं. जिनमें पानी अधिक समय तक स्थिर बना रहता है. इसकी खेती उष्णकटिबंधीय भागों में की जाती है. इसके पौधे को विकास करने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है.
तालाब तैयार करना

मखाना की खेती पूरी तरह से ऑर्गेनिक तरीके से की जाती है. इसके लिए मिट्टी को खोदकर उसमें पानी भर दिया जाता है. उसके बाद मिट्टी और पानी को मिलकर कीचड़ तैयार किया जाता है. इस कीचड़ वाले भाग में इसके बीजों को लगाया जाता है. कीचड़ तैयार करने के बाद तालाब में फिर से पानी भर दिया जाता है. तालाब में पानी की भराई कम से कम 6 से 9 इंच तक की जानी चाहिए. इसके अलावा अधिकतम 4 फिट पानी काफी होता है. इन तालाबों को बीज लगाने के लगभग दो महीने पहले तैयार किया जाता है।
तालाब विधि
यह मखाना की खेती करने की परम्परागत विधि है। इस विधि में बीज को बोने की आवश्यकता नहीं होती हैं क्योंकि पूर्व वर्ष के तालाब में बचे बीज आगामी वर्ष के लिए बीज का काम करते हैं। जबकि खेती विधि में मखाना के बीज को सीधे खेतों में बोया जाता है या पिफर धन की पफसल की भाँति तैयार पौध् की रोपनी नये तालाब में की जाती है। परम्परागत विधि में मखाना के खेतों में माँगुर, सींघी, केवई, गरई, ट्रैश आदि जंगली मछलियाँ बाढ़ के पानी के साथ तालाब में प्रवेश कर जाती हैं जिसे किसान अतिरिक्त पफसल के रूप में प्राप्त करते हैं।
बीज रोपण का तरीका और टाइम
मखाना के बीजों को तालाब की निचली सतह में लगाते हैं. लेकिन बीजों को तालाब में लगाने से पहले पानी में उत्पन्न हुई सभी तरह की खरपतवार को नष्ट कर तालाबों की सफाई कर देनी चाहिए. जिससे पौधे की पैदावार या पौधे पर किसी तरह का कोई रोग या खरपतवार का असर देखने को ना मिले. खरपतवार नष्ट करने के बाद इसके बीजों को तालाब की निचली सतह में 3 से 4 सेंटीमीटर नीचे मिट्टी में लगाते हैं. एक हेक्टेयर में बनाए गए तालाब में लगभग 80 किलो बीज लगाया जाता हैं।
इसके बीजों को सीधा तालाब में उगा सकते हैं. लेकिन कुछ किसान भाई इसके बीजों की पौधा तैयार कर खेतों में लगाते हैं. इसके बीजों से नवम्बर या दिसम्बर माह में ही पौध तैयार कर ली जाती है. उसके बाद इन्हें तालाब में लगाया जाता है. इसके पौधों को तालाब में लगाने का सबसे उपयुक्त टाइम जनवरी और फरवरी का महीना होता है. इस विधि में 30 से 90 किलोग्राम स्वस्थ मखाना बीज को तालाब में दिसम्बर के महीने में हाथों से छिंटते हैं। बीज को लगाने के; दिसम्बर से जनवरी 35 से 40 दिन बाद पानी के अंदर बीज का उगना शुरू हो जाता है तथा फरवरी के अंत या मार्च के शुरू में मखाना के पौधे जल की ऊपरी सतह पर निकल आते है। इस अवस्था में पौधे से पौधे एवं पंक्ति से पंक्ति के बीच की दूरी 1 मीटर X 1 मीटर बनाये रखने के लिए अतिरिक्त पौधें को निकाल दिया जाता है।
रोपाई विधि
स्वस्थ एवं नवजात पौधे की रोपाई मार्च से अप्रैल के महीने में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी 1.20 मी. – 1.25 मी. पर की जाती है। रोपाई के लगभग दो महीने के बाद चमकीले बैंगनी रंग का एकल फूल जहाँ-तहाँ से निकलना शुरू हो जाता है। फूल निकलने के 35 से 40 दिनों बाद फल पूरी तरह से विकसित एवं परिपक्व हो जाते हैं। फल एवं मखाना के सभी भाग कँटीले प्रकृति के होते है। मखाना के फल पूरी तरह से पिरपक्व हो जाने के पश्चात गुद्देार फल फटना शुरू हो जाते हैं। मखाना के फल पूरी तहर से परिपक्व हो जाने के पश्चात् गुद्देदार पफल पफटना शुरु हो जाते हैं।
फल फटने के बाद पानी की ऊपरी सतह पर तैरते है तथा 2 से 3 दिन तालाब की निचली सतह पर बैठना शुरू हो जाते हैं। फूलों के विकसित होने एवं फल के फटने की प्रक्रिया सितम्बर के महीने तक चलती रहती है। सितम्बर के महीने के अंत या अक्टूबर महीने में स्थानीय औजार, जिसे गंजा कहते है, की सहायता से जलाश्य की सतह में 5 से 30 सेमी. की गहराई में बैठे बीजों को कुशल श्रमिकों की सहायता से जमा किया जाता है। फसल कटाई के 2 से 3 महीने बाद जलाश्य में शेष बचे लगभग एक तिहाई बीज जो इकठ्ठा करते समय छूट जाते है दूसरी फसल के लिए अंकुरित होना शुरू कर देते हैं।
खेत प्रणाली
यह मखाना की खेती करने की नई विधिहै जिसे मखाना अनुसंधन केन्द्र द्वारा विकसित किया गया है। इस विधिद्वारा मखाना की खेती 1 फीट तक पानी से भरे कृषि भूमि में की जाती है। यह मखाना की खेती की बहुत ही सरल विधिहै जिसमें एक ही खेत में मखाना के साथ-साथधन एवं अन्य फसलों को उपजाने का अवसर मिलता है। मखाना के पौधें को सर्वप्रथम नर्सरी में तैयार किया जाता है। रोपाई प्रायः पफरवरी के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक की जा सकती है जो मुख्यतः खेत की उपलब्ध्ता एवं बिचड़े की स्थिति पर निर्भर करती है। इस विधि के द्वारा मखाना की खेती का समय घटकर मात्रा चार महीने रह जाता है। मखाना की खेती का विस्तृत वर्णन निम्न है।
नर्सरी
मखाना एक जलीय पौध है इस कारण पानी को संग्रहित करने वाली कार्बनिक पदार्थ से युक्त क्ले मिट्टी में मखाना का पौध सही रूप से विकास करता है। यही वजह है चिकनी एवं चिकनी-दोमट मिट्ट्टी इसके लिएबहुत उपयुक्त मानी जाती है। खेत को मखाने के लिए तैयार करने हेतु दो से तीन गहरी जुताई की आवश्यकता होती है तथा बिचड़े के सही विकास हेतु रासायनिक खाद नाइट्रोजन, पफास्पफोरस एवं पोटाश क्रमशः 100ः60ः40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के अनुपात में डालना चाहिए। इसके बाद खेत जिसमें मखाना के बिचड़े को तैयार करना है, का समतलीकरण कर दो पफीट ऊँचा बाँध् खेत के चारों तरपफ बनाना चाहिए। खेत तैयार होने के बाद उसमें लगभग 1.5 पफीट पानी डाल कर मखाना के बीज की दिसम्बर महीने में बोआई कर देनी चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्रा में मखाने की बुआई के लिए लगभग 500 मी क्षेत्रा में नर्सरी तैयार करना चाहिए। इसके लिए लगभग 20 किलो मखाना के स्वस्थ बीज को पानी से भरे तैयार खेत में एक समान छींट देना चाहिए। बिचड़ा तैयार होने तक लगभग एक फीट पानी का स्तर बनाये रखना चाहिए दिसम्बर से अप्रैल तक। प्रायः यह देखा गया है कि प्रारंभिक अवस्था में बिचड़ा में एपिफड का प्रकोप बना रहता है। लेकिन कीटनाशक का छिड़काव कर बिचड़ा को एफिड से बचाया जा सकता है। मार्च महीने के अंत तक बिचड़ा रोपाई के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।
खेत की तैयारी
खेत की 2 से 3 गहरी जुताई के बाद ट्रैक्टर या देशी हल की सहायता से पाटा देकर खेत को मखाना की खेती के लिए तैयार करते है। मखाना की खेती के लिए खेत उपलब्ध् होने पर मखाना के लिए खेत की तैयारी पफरवरी के प्रथम सप्ताह से अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक हर हाल में पूरी कर लेनी चाहिए। बिचड़ा के रोपाई से पूर्व खेत के चारों तरपफ 2 पफीट ऊँचा बाँध् बनाकर लगभग 1 पफीट पानी भर देना चाहिए। उसके बाद ट्रैक्टर आधरित गीली जुताई करने के उपकरण से 2 से 3 बार खेतों में कदवा करना चाहिए। खेतों में कदवा करना मखाना की खेती के लिए परम आवश्यक है क्योंकि यह नीचे की ओर होने वाले पानी के रिसाव को रोकता है।
खाद एवं उर्वरक
परम्परागत तरीके से तालाबों में मखाने की खेती में किसान खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग नहीं करते थे। लेकिन इसके विपरीत खेतों में मखाना की पैदावार लेने के लिए खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग अति आवश्यक है। मखाना को बड़े एवं भारी पत्तों वाला जलीय पौध होने की वजह से ज्यादा पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं। मखाना की फसल में औसतन नेत्राजन, स्पफूर एवं पोटाश क्रमशः 100ः60ः40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। पोषक तत्वों की उपर्युक्त मात्रा को पूरा करने के लिए कार्बनिक (15 टन/हे.) एवं अकार्बनिक दोनों तरह के उर्वरकों की आवश्यकता पड़ती है।
खेतों में रोपाई
नर्सरी में पौध तैयार होने पर स्वस्थ पौधें को उखाड़ कर उन्हें अच्छी तरह से कदवा किये गये खेत में पंक्तियों में ही लगाना चाहिए। अनुसंधन से यह पाया गया कि पौधें से पौधें एवं पंक्ति मखाना की रोपाई के लिए मुख्य खेत की तैयारी 9 से पंक्ति के बीच की दूरी 1.20 मी. X 1.25 मी. रखनी चाहिए ताकि मखाने के पौधें की सही बृद्धि एवं विकास हो सके। पौधें की रोपाई का कार्य फरवरी के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के द्वितीय सप्ताह तक अवश्य कर लेना चाहिए ताकि पफसल से अध्कि से अध्कि उत्पादन लिया जा सके।
जल प्रबंधन
परम्परागत तरीके से मखाना की खेती करने पर सामान्यतः किसानों को तालाबों में ज्यादा जल भराव करना होता था, वैसे भी जलीय पौध होने की वजह से मखाना की खेती के लिए निरंतर जल की व्यवस्था अति आवश्यक है। नर्सरी में मखाना के पौधें को तैयार होने में लगभग चार महीने लगते है। चूँकि इसकी रोपाई मार्च के अंत एवं अप्रैल महीने में होती है तथा रोपाई के बाद इसकी बृद्धि एवं विकास अप्रैल से अगस्त महीने में होती है जब पफसल को सामान्यतः पानी मानसून में होने वाली वर्षा से प्राप्त होता है। असामान्य वर्षा के समय किसानों को 4 से 5 बार या इससे ज्यादा भी सिंचाई की आवश्यकता होती है।
खरपतवार नियंत्रण
मखाने के विकास की प्रारंभिक अवस्था में अवांछनीय पौधें का प्रकोप बढ़ जाता है। अतःशुरूआत में मखाना के खेत से कुछ अंतराल पर खरपतवार को निकालते रहना चाहिए। पौधें की रोपाई के 30 से 40 दिन बाद मखाना के पत्ते का वानस्पतिक विकास कापफी तेजी से होता है। खरपतवार की बृद्धि कम हो जाती है। समेकित कृषि प्रबंध्न में मखाना के साथ मछली एवं सिंघाड़ा लेने से दिसम्बर से जनवरी महीने में मछली के निकासी के वक्त जाल डालने से खरपतवार काफी हद तक कम हो जाते है।पुष्प एवं फल का लगना
मखाना के पौधें में पुष्प एवं पफल का बनना मई के महीने में शुरू होता है जो अक्टूबर एवं नवम्बर तक चलता रहता है। मखाना के पौधें की यह खासियत है कि इसके सभी पौधंे में फूल एवं फल एक साथ नहीं लगते। फल परिपक्व होने के खेत प्रणाली में मखाना की रोपाई पुष्पावस्था में मखाना की फसल 10बाद पफटना शुरू हो जाता है। परिणाम स्वरूप मखाना के बीज पानी की ऊपरी सतह पर तैरने लगते है। पिफर 2 से 3 दिनों बाद तालाब/खेत की निचली सतह पर बीज बैठ जाता है। फल के पफटने एवं बीज के पानी की सतह के नीचे बैठने की क्रिया पफसल अवध् ितक चलती रहती है।
फसल की कटाई
मखाना के संदर्भ में पफसल कटाई का मतलब तालाब/खेत की सतह पर एकत्रा बीजों का एकत्राीकरण होता है। मखाना की पारम्परिक खेती में बीजों के जमा करने का सिलसिला अगस्त से अक्टूबर महीने तक चलता है। जबकि खेतों में यह प्रक्रिया अगस्त महीने तक चलती है। इसका मुख्य कारण खेतों की कम गहराई (1 से 2 फीट) का होना है। प्रायः बीजों का एकत्राीकरण सुबह 6 से 11 बजे तक में पारम्परिक तरीके से की जाने वाली खेती में किया जाता था। करीब 4 से 5 लोगों का समूह बीज को तालाब की सतह से एकत्रा करते थे। बीज को एकत्रा करने में लगने वाला समय उसकी तालाब/खेतों में उपलब्ध् मात्रा पर निर्भर करता है। खेतों में की जाने वाली मखाने की खेती में पानी की गहराई कम होने की वजह से बीजों को एकत्रित करना कापफी सरल है तथा कम अवध् िमें हो जाता है।
पौधों का विकास
बीज रोपाई के लगभग एक से डेढ़ महीने बाद इसके पौधे सतह पर कांटेदार पत्तों के रूप में फैलने लगते हैं. जिनसे पूरा तालाब ढक जाता है. इन पत्तियों पर ही इसके फूल खिलते हैं. इसके फूलों के खिलने के लगभग तीन से चार दिन बाद इनमें बीज बनने लगते हैं. पत्तियों पर बीज लगने के लगभग दो महीने बाद ये पककर तैयार हो जाते हैं. पत्तियों पर पककर तैयार हुए बीज पौधे से अलग होकर पानी सतह पे तैरने लगते है. इसके बीज पानी की सतह पर एक से दो दिन तक तैरते रहते हैं. उसके बाद बीज पानी की सतह में चले जाते है. जिन्हें किसान भाई पौधों को हटाने के बाद सतह से निकालते हैं.
बीज उत्पादन
तालाब विधि से मखाना की खेती करने पर औसतन 1.4 से 2.2 टन/हे. बीज का उत्पादन होता है जो बुआई के लिए प्रयुक्त बीज की आनुवांशिक क्षमता पर निर्भर करता है। जबकि खेती विधि से मखाना की खेती करने पर उसी बीज को इस्तेमाल करने पर उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है जो 2.6 से 3.0 टन/हे. दर्ज की गई हैं। अब तक मखाना की कोई उन्नत किस्म उपलब्ध् नहीं है। परन्तु उन्नत किस्म को विकसित करने के क्षेत्रा में अनुसंधन जारी है और कुछ विशु( वंशक्रम का विकास किया जा चुका है जिसकी उत्पादन क्षमता 2.8 से 3.0 टन/हे. है।
मखाना के पौधे में लगने वाले कीट एवं व्याधि
अन्य फसलों की भाँति मखाना की पफसल में भी कीड़े एवं रोगों का प्रकोप बना रहता है। इस पफसल में मुख्यतः एपिफड, केसवर्म, जड़ भेदक के प्रकोप का खतरा बना रहता है। नर्सरी में मखाना का बिचड़ा तैयार करते समय एपिफड के प्रकोप का ज्यादा खतरा रहता है। परन्तु केसवर्म एवं जड़ भेदक का प्रकोप पूर्ण रूप से विकसित मखाना के पौधें में दिखाई पड़ता है।
एफिड
एपिफड सामान्यतः मखाना के नवजात पौधें की पत्तियों को नुकसान पहुँचाते हैं। जबकि केसवर्म एवं जड़ भेदक क्रमशः फूल एवं जड़ को नुकसान पहुँचाते हैं।
नियंत्राणः एपिफड एवं केसवर्म के प्रकोप से पौधें को सुरक्षित रखने के लिए 0.3 प्रतिशत नीम तेल के घोल का छिड़काव करना चाहिए। जड़ भेदक से बचाव के लिए 25 किलोग्राम नीम की खल्ली को प्रारम्भ में खेत की तैयारी करते वक्त डालना चाहिए।
झुलसा रोग
मखाना में होने वाला झुलसा रोग एक बहुत ही नुकसानदायक फफूँदीजनक रोग है। इसे उत्पन्न करने वाला ऑर्गनिज़म को अल्टरनेरिया टिनुईस कहते हैं। यह प्रायः पूर्ण रूप से विकसित मखाना के पौधें में होता है। इस रोग से प्रभावित पत्तियों के ऊपरी सतह पर गहरे भूरे या काले रंग का लगभग गोलाकार मृत क्षेत्रा जहाँ-तहाँ बन जाता है। इसमें प्रायः समक्रेंद्री बहुत सारे छल्ले एवं पटरी रूपी विकृति हो जाती जो टारगेट बोर्ड को इपफेक्ट देती है। बहुत सारे ध्ब्बे मिलकर बाद में बड़े एक पौधें द्वारा उत्पादित बीज 13 ध्ब्बे बनाते हैं। जब यह बीमारी अन्तिम अवस्था में होती है तो पत्ते पूरी तरह से जले या झुलसे हुये प्रतीत होते हैं।
नियंत्रणः मखाना में लगने वाले झुलसा रोग को नियंत्रित करने के लिए काॅपर ऑक्सीक्लोराइड, डाइथेर्न Z-78 या डाइथेन M-45 का 0.3 प्रतिशत घोल का पन्द्रह दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करना चाहिए।
फल सड़न
हाल में मखाना में पफल सड़न रोग देखा गया है पर अभी तक इसे उत्पन्न करने वाले कीटाणु का पता नहीं चल पाया है। पिफर भी इसे कवक जनित रोग की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि इस रोग में कार्बेन्डाजिम एवं डाइथेन M-45 के 0.3 प्रतिशत घोल से पत्तियों पर छिड़काव करने पर यह बीमारी कापफी हद तक नियंत्रित हो जाती है। इस रोग से ग्रसित पौध पूर्ण रूप से स्वस्थ नजर आता है परन्तु इसके अविकसित पफल सड़ना शुरू हो जाते हैं जिससे आर्थिक उत्पाद कापफी प्रभावित होता है।
अति अंगवृद्धि (हाइपरट्राॅफी)
कुछ पौधें में अति अंगबृद्धि (हाइपरट्राॅपफी) रूपी बीमारी को देखा गया है हालांकि यहमखाना के पौधे के लिए गंभीर बीमारी नहीं हैं। लेकिन हाइपरट्राॅपफी से ग्रसित पौधें के पूल एवं पत्ते असामान्य बृद्धि से प्रभावित उत्तकों की वजह से बुरी तरह से खराब हो जाते हैं। यह बीमारी डोसानसियोपसिस यूरेलि नामक फफूद से भी होता है। पत्तियों एवं फूलों में होने वाली असामान्य बृद्धि की वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इस बीमारी के लक्षण किसी खास जगह पर नहीं होते लेकिन साधरणतः यह पत्रा फलक से डंठल एवं पुष्पासन की तरफ फैलता है इस कारण फूल के निचले हिस्से को कापफी क्षति होती है। परिणामस्वरूप फूल में बीज भी नहीं बन पाते। अभी तक इस बीमारी की रोक थाम के लिए कोई भी शोध् रिपोर्ट नहीं है। अतः जल्द से जल्द इस बीमारी की रोकथाम के लिए गहन अध्ययन एवं शोध् किये जाने की आवश्यकता है।
बीजों की पैदावार
इसके पौधे कांटेदार होते हैं जो पूरे तालाब की ढके हुए होते हैं. इस कारण जब इसके बीज पौधे से अलग होते हैं तो उन्हें किसान भाई एकत्रित नही कर पाते. जिसके कारण बीज सतह में चले जाते हैं. उसके बाद जब पौधों पर सभी बीज पककर गिर जाते हैं तब पौधे को हटाकर सतह से इसके बीजों को एकत्रित कर लिया जाता है. इस दौरान इसके बीजों को निकालने में एक से दो महीने का टाइम लग जाता है. जिससे बीजों में काफी ज्यादा नुकसान हो जाता है. इसके बीजों को पानी से निकालकर उनके छिलके को हटाकर साफ़ किया जाता है. उसके बाद उन्हें लकड़ी की हथोड़ी से पीटकर उनसे लावा निकाल लिया जाता है. तीन किलो कच्चे बीजों से एक किलो मावा प्राप्त होता है. जिससे मखाना तैयार किया जाता है. एक क्विंटल मखाना गुडी से लगभग 40 किलो मावा निकलता है. जिससे किसान भाइयों की अच्छी कमाई हो जाती है.
