कृषि महाविद्यालय रायपुर के छात्रो द्वारा ग्राम बहानाखाङी ब्लाक आरंग जिला रायपुर के अंतर्गत नील हरित शैवाल के फायदो की जानकारी नील हरित शैवाल तैयार कर किसानो के घर प्रदर्शनी के द्वारा दी गयी । छात्रों ने अपने वैज्ञानिको के मार्गदर्शन में बताया गया कि कैसे नील हरित शैवाल का उत्पादन कर प्रति एकड़ 25kg यूरिया की बचत कर सकते हैं और मृदा मे सूक्ष्म पोषक तत्वो की उपलब्धता बढ़ा सकते है। अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय डॉ. के. एल. नंदेहा एवं कार्यक्रम समन्वयक डॉ. घनश्याम दास साहू के मार्गदर्शन में कार्य रहे है। यह नील हरित शैवाल बहुत ही कम खर्च मे तैयार कर सकते है इस प्रकार जैविक तरीको के उपयोग से किसानो को कम लागत आयेगा । इस कार्यक्रम मे मुख्य रूप से ङाॅ घनश्याम दास साहु सहित चतुर्थ वर्ष के छात्र उपस्थित रहे। नील हरित शैवाल वायुमंडलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर, धान की फसल को आंशिक मात्रा में नाइट्रोजन की पूर्ति करता है। यह जैविक खाद नाइट्रोजनधारी रासायनिक उर्वरक का सस्ता व सुलभ विकल्प है। यह धान की फसल को न सिर्फ नाइट्रोजन की पूर्ति करता है, बल्कि उस धान के खेत में नील हरित शैवाल के अवशेष से बनी खाद के द्वारा उसकी गुणवत्ता व उर्वरता कायम रखने में मददगार साबित होता है। नील हरित शैवाल की प्रजातियां नॉस्टाक, एनाबीना, कैलोथ्रिक्स, साइटोमा, टोलिपोथ्रिक्स आदि हैं। नील हरित शैवाल प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा ग्रहण करके वायुमंडलीय नाइट्रोजन का भूमि में स्थिरीकरण करता है। यह एक स्वतंत्र रूप से जीवनयापन करने वाला जीवाणु होता है, जिसे दलहनी फसलों की भाति ऊर्जा के लिए धान के पौधे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। धान के खेत में चूंकि सदैव पानी भरा रहता है, इसलिए नील हरित शैवाल की वृद्धि एवं विकास के लिए अनुकूल स्थितियां विद्यमान रहती हैं। धान के ब्यासी अथवा रोपा वाले खेत में धान के पौधों को रोपने के 6 से 10 दिनों के भीतर, नील हरित शैवाल के 10 कि.ग्रा. सूखे पाउडर को पूरे खेत में छिड़ककर उपचारित कर दिया जाता है। नील हरित शैवाल से उपचारित करने के पूर्व उस खेत में लगभग 8 से 10 सें.मी. पानी ही रखें और 20 दिनों तक इसे खेत में कायम रखें। इससे नील हरित शैवाल की बढ़ोतरी और फैलाव ठीक तरह से होता है। शैवाल की यही बढ़ोतरी और फैलाव वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने में सहायक होता है। नील हरित शैवाल से उपचार में निम्नलिखित बातों का अवश्य ध्यान देना चाहिये:
खेत सूखने न पाये, इसके लिये खेत के मेड़ों में से चूहे के बिल आदि छेदों को बंद कर दें।
खेत तैयार करने के समय ही फॉस्फोरस की पूरी मात्रा डाल दें। इसकी उपस्थिति, नील हरित शैवाल की वृद्धि के लिये आवश्यक होती है।
