विवेकानंद जी की जयंती पर कृषि विश्वविद्यालय पर हुई विभिन्न प्रतियोगिता

स्वामी विवेकानंद जी के जन्मजयंती के उपलक्ष्य पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित समस्त कृृषि महाविद्यालयों, कृषि विज्ञान केन्द्रों एवं अन्य संस्थानों में राष्ट्रीय युवा दिवस वर्चुअल माध्यम से मनाया गया। इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कुलपति डाॅ. एस.एस. सेंगर के मुख्य आतिथ्य में राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन किया गया।आज राष्ट्रीय युवा दिवस के पावन अवसर पर राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा विश्वविद्यालय में वाद- विवाद प्रतियोगिता ” सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवा पीढ़ी की प्रगति में बाधक” एवं भाषण प्रतियोगिता “देश के वैचारिक और बौद्धिक विकास में स्वामी विवेकानंद जी की भूमिका” विषय पर आयोजित किया गया।जिसमें प्रतिभागियों ने बढ़ चढ़कर भाग लेकर अपने विचारों को व्यक्त किया। इस परिप्रेक्ष्य में स्वामी विवेकानंद जी के दिए गए उपदेशों और विचारों और घनीभूत भारत से सन्दर्भित विचारों और स्वामी विवेकानंद जी के जीवन के परिस्थितियों का स्मरण कर अनुसरण कर प्रेरणादायी उद्बोधन का सम्प्रेषण किया।कुलपति महोदय ने बताया कि आज के युवाओं को विवेकानंद जी के दिखाए हुए रास्तों और शिक्षाओं पर चलने कि आवश्यकता है। उन्होंने ये भी बताया कि आज के युवाओं को ऐसे वातावरण में रहने की जरूरत है जो केवल उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से ही नहीं बल्कि सांसारिक रूप से भी उन्नति और विकास करने में सहायता करें। विद्यार्थियों को अपना उद्देश्य याद करके उसे पूरा करने की सीख का उर्जा देते हुए अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय रायपुर डॉ एम. पी. ठाकुर जी ने कहा कुछ भी असंभव नहीं हैं विद्यार्थी चाहे तो आसमान की ऊंचाइयों को भी छू सकते हैं। इस अवसर पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलसचिव, श्री जी. के. निर्माम; कृषि महाविद्यालय रायपुर के अधिष्ठाता डाॅ. एम. पी. ठाकुर, अधिष्ठाता छात्र कल्याण डाॅ. (मेजर) जी.के. श्रीवास्तव, राष्ट्रीय सेवा योजना के विश्वविद्यालय कार्यक्रम समन्वयक डाॅ. पी.के. सांगोड़े, राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डाॅ. पी.एल. जाॅनसन एवं डाॅ. सुबुही निषाद सहित बड़ी संख्या में प्राध्यापक, विद्यार्थी एवं कर्मचारी उपस्थित थे।साथ ही इस कार्यक्रम में खाद्य प्रौद्योगिकी के अधिष्ठाता डॉ. एम. पी. त्रिपाठी, डॉ. आर. एन. गांगुली (प्राध्यापक, कीट विज्ञान ),डॉ. एम. एल. लखेरा (विभागाध्यक्ष, कृषि सांख्यिकी ) और अन्य भी उपस्थित थे।

UPAJ- खेती होगी सहज जब किसानों के साथ होगी “उपज”

प्रायः छत्तीसगढ़ के किसान भाई बीजो का उपचार किये बिना ही बीजो की बुवाई कर देते है जिससे बाद में बीज जनित रोगों से किसान भाई परेशान रहते है एवं अंधाधुन्ध रसायनिक दवाओं का उपयोग इन रोगों के उपचार में करते है।जिसके कारण उत्पादन भी काफी प्रभावित होता है और स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों को आमंत्रित करते है। ऐसे में जरूरत है कुछ ऐसे उत्पादों की जो बीज जनित रोगों में प्रभावशाली हो। उनमें से एक है “UPAJ”

जानिए कैसे उपयोग में लाया जा सकता है “UPAJ

कैसे करे UPAJ से बीजोपचार
धान के बीजो का बीजोपचार करने के लिए धान के बीजो को प्लास्टिक के शीट में डालकर फैला लेंवे। प्रति किलो बीज के लिए “UPAJ” 5 ग्राम की मात्रा में लेकर उसमें इतना पानी मिलावे की पेस्ट बना जाए पेस्ट को बीजो पर छिड़ककर पेस्ट के साथ बीजो को रगड़ने से काले रंग की परत बीजो पर चढ़ जाएगी अगर बीजो पर “UPAJ” पाउडर स्वरूप में दिख रहा हो तो उसमें थोड़ा और पानी मिलाकर रगड़ने की आवश्यकता है। कब बीजो को छायादार जगह पर सूखा लेंवे। और अब बुवाई के लिए प्रयोग करे।


खाद में मिलाकर भी प्रयोग कर सकते है।

पहली बार खाद डालते समय खाद में 500 ग्राम UPAJ प्रति एकड़ के हिसाब से डालने पर 8 से 10 दिन में स्प्ष्ट रूप से प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देने लगता है।

ये काम करता है” “UPAJ

1.मिटटी को उपजाऊ बना देता है, मिटटी में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ा देता है।

2. मिटटी में केंचुए काम करना सुरु कर देते है।

3.फसल को मिटटी से होनेवाले सभी रोगों से मुक्ति दिलाता है।

4. “UPAJ” का उपयोग फसल की प्रारंभिक अवस्था अथवा आधार खाद के साथ मिलाकर उपयोग करने से खाद की उपयोगिता को बढाता है। इसके क्षरण को रोककर पौधों के लिए भरपूर भोजन उपलब्ध करता है ।
5. यह सम्पूर्ण जाइम का कार्य करता है | इसके उपयोग के पश्चात् अलग के किसी प्रकार के जाइम की आवश्यकता नहीं है |

UPAJ” उपयोग से लाभ :-
1. पोधे के भोजन ग्रहण करने वाली जड़ो का विकास करता है तथा पौधे की बढवार में सहायक।
2. पौधे में संतुलित नाइट्रोजन ग्रहण तथा भूमि में उपस्थित नाइट्रोजन की उपयोगिता को बढाता है ।
3. भूमि में उपस्थित पोटाश, कैल्शियम तथा फास्फोरस को पौधे के लिए उपलब्ध कराता है ताकि पौधे, जड़ो के माध्यमसे आसानी से ग्रहण कर सके ।
4. पौधे में संतुलित पोषक तत्वों को भोजन के रूप में उपलब्ध कराता है तथा विपरीत परिस्थिति अथवा ओवर दोस होने पर इसके विपरीत प्रभाव को कम करता है ।
5. पौधे में प्राकृतिक रूप से रोग तथा कीट प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है।
6. भूमि की उर्वरा शक्ति को बढाता है तथा खाद एवं अन्य क्षरण को कम करता है और जल धारण क्षमता को बढाता है ।
7. अंकुरण क्षमता को बढाता है तथा भूमि के पी.एच. को न्यूट्रल करता है।

“UPAJ” के उपयोग की विधि :-
1. लगभग सभी प्रकार के जैविक एवं रासायनिक खाद के साथ मिलाकर उपयोग किया जा सकता है |
2. सिस्टमिक कीटनाशक एवं कैल्शियम नाइट्रेट के साथ न मिलाये |
3. सभी घुलनशील खाद के साथ मिलाकर भी उपयोगकिया जा सकता है |

UPAJ की मात्रा :-
1. आधार खाद के साथ मिलाकर डालने के लिए 500 ग्राम प्रति एकड़ |
2. स्प्रे के व्दारा : 250 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी के साथ मिलाकर
3. ड्रीप के व्दारा : 250 ग्राम प्रत्येक बार घुलनशील खाद के साथ मिलाकर देना उचित है |

लैब टेस्टिंग रिपोर्ट

उपलब्धता एवं अधिक जानकारी के सम्बंध में सम्पर्क करें विकास एग्रोटेक के (MD श्री पंकज मिश्रा ) मोबाईल नम्बर:-+9179785330

नॉलेज:-छत्तीसगढ़ में अवर्षा कभी नहीं होगी,अगर सूखा भी पड़ा तो आंशिक ही पड़ेगा।

छत्तीसगढ़ में मानसून बादलों के रास्ते पर है। मध्य उत्तर भारत के लिए बादल हमेशा छत्तीसगढ़ के रास्ते से ही होकर गुजरते है और बरसते भी है, इतना हो सकता है कि किसी जिले में ज्यादा वर्षा तो किसी जिले में कम यही नहीं करीब 4 महीनों के मानसून जैसे छत्तीसगढ़ में धान की खेती के लिए ही है। जून में हर खेत मे पानी चाहिए।सितंबर अक्टूबर में कुछ खेतो में पानी की जरूरत होती है। जून से लेकर अक्टूबर तक मानसून यह जरूरत पूरी करता है।

खेती को जितना पानी चाहिए, मानसून दे जाता है, जब जरूरत, तब तक रहता है छत्तीसगढ़ में बारिश का सीजन

जानिए क्या कहते है विशेषज्ञ


कृषि विभाग के अनुसार मानसून के दौरान राज्य
में औसत 1250 मिमी बारिश होती है। कृषि
विभाग के ही पिछले एक दशक में बारिश का औसत
1219 मिमी के आसपास है। यानी हर साल औसत
के आसपास बारिश हो रही है।

इतना पानी खरीफ फसल के लिए पर्याप्त है। इंदिरा गांधी कृषि विवि के कृषि मौसम विभाग के एचओडी डा. जी के दास के अनुसार मानसून की बारिश जून से सितंबर तक होती है। छत्तीसगढ़ में 90 से 100 दिन में पकने वाले धान लिए जाते हैं। जून के पहले पखवाड़े तक एक-दो अच्छी बारिश चाहिए। इससे बुआई, रोपा इत्यादि का काम हो जाता है।

इसके बाद 20 से 25दिन ज्यादा बारिश की जरूरत नहीं होती। यानी 15 जुलाई के आसपास खेतों को पानी चाहिए होता है, तब छत्तीसगढ़ में मानसून पूरी ताकत से बरसता है। सबसे ज्यादा बारिश जुलाई और अगस्त में होती है। देर से बुआई करने वाले कुछ किसानों को अगस्त के बाद सितंबर में भी बारिश की जरूरत होती है। राज्य में मानसून की विदाई 15 अक्टूबर के बाद ही होती है। तब तक खेतों को पर्याप्त पानी मिल चुका होता है।

खाड़ी में ज्यादा प्रेशर न भी हो तो छत्तीसगढ़ की जरूरत लायक बारिश मिल ही जाती है

छत्तीसगढ़ के दक्षिण-पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण-पूर्व में बंगाल की खाड़ी है। बंगाल की खाड़ी में कुछ भी हलचल हो या चक्रवात उठे तो समुद्र से नमी आनी जरूरी है। समुद्र से नजदीक होने के कारण चार-पांच दक्षिण राज्यों के बाद मानसून सीधे छत्तीसगढ़ पहुंच जाता है। राज्य से होकर ही मानसून शेष भारत तक पहुंचता है। खाड़ी में ज्यादा प्रेशर न भी हो तो छत्तीसगढ़ राज्य को जरूरत लायक बारिश मिल ही जाती है।

इसलिए राज्य में बहुत कम हालात बनते हैं कि बारिश की कमी के कारण फसल चौपट हुई हो। लालपुर मौसम केंद्र के मौसम विज्ञानी एच पी चंद्रा के अनुसार राज्य में आमतौर पर औसत के आसपास और कभी-कभी उससे अधिक भी वर्षा हो जाती है।

मानसून अच्छा रहने पर पूरे प्रदेश में अच्छी बारिश होती है। वर्षा का असमान वितरण होने पर ही कुछ कुछ साल राज्य के कुछ जिलों में कम पानी गिरता है, लेकिन ऐसा कोई जिला नहीं है जहां बारिश ही नहीं हो। इस साल अप्रैल-मई के बाद जून में भी मौसम काफी अच्छा है। उम्मीद है कि मानसून में राज्य में अच्छी बारिश होगी।

साभार

डॉ.एचपी चंद्रा
विशेषज्ञ मौसम विज्ञान केंद्र

डॉ.जीके दास

विभागाध्यक्षकृषि मौसम विज्ञान विभाग
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर

किसानों हेतु उच्च गुणवत्ता के नवीन छः सब्जी के किस्म का हुआ विमोचन

कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सब्जियों की छह नई किस्मों को भारत सरकार की मंजूरी

केन्द्रीय प्रजाति विमोचन उपसमिति ने व्यवसायिक खेती एवं बीज उत्पादन हेतु अधिसूचित किया

रायपुर, 08 जून, 2021। भारत सरकार द्वारा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं के अन्तर्गत विकसित सब्जीवर्गीय फसलों की छह नवीन किस्मों को व्यावसायिक खेती एवं गुणवत्ता बीज उत्पादन हेतु मंजूरी दी गई है। भारत सरकार के कृषि एवं कृषक कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत केन्द्रीय प्रजाति विमोचन एवं बीज उपसमिति द्वारा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित इंदिरा कंकोडा-2, इंदिरा विंग्डबीन-2, छत्ताीसगढ़ शाखेन बन्डा-1, सी.जी. डांग कांदा-1, छत्तीसगढ़ सेम-1 एवं छत्तीसगढ़ सफेद बैगन-1 को व्यवसायिक खेती एवं बीज उत्पादन हेतु अधिसूचित किया गया है।
केन्द्रीय प्रजाति विमोचन एवं बीज उपसमिति ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित जिन छह नवीन सब्जीवर्गीय फसल की किस्मों को अधिसूचित किया है उनमें कंकोडा की नविन किस्म (इंदिरा कंकोडा-2) जिसे छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, एवं महाराष्ट्र राज्यों के लिए विमोचित किया गया है। इसकी उपज क्षमता 3500 से 4000 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर है एंव यह किस्म 110-115 दिनो में तैयार हो जाता हैं। यह फसल उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटिन एंव विटामीन से भरपूर होता है। इस किस्म का विकास कृषि महाविद्यालय अम्बिकापुर द्वारा किया गया है। विगडबीन की नवीन किस्म (इंदिरा विंग्डबीन-2) चैधारी सेम किस्म है इसे छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड राज्य के लिए विमोचित किया गया है। इसकी उपज क्षमता 1500-1600 कि.ग्रा. प्रति हे. होता है एवं हरीफल्ली 100 दिनो में तैयार हो जाता है। इस किस्म का विकास कृषि महाविद्यालय अम्बिकापुर द्वारा किया गया है। शाखेन बन्डा की नवीन किस्म (छत्तीसगढ़ शाखेन बन्डा-1) 5-6 माह में तैयार हो जाती है और इस किस्म की उपज क्षमता 43.8 टन प्रति हेक्टेयर है। यह प्रजाति कार्बोहाइड्रेट से भरपूर है एवं इसमें खुजलाने की समस्या नही होती है। इसका आकार बड़ा होता है। इस किस्म का विकास शहीद गुंडाधूर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र जगदलपुर द्वारा किया गया है एवं इस किस्म को छत्तीसगढ़ राज्य हेतु विमोचित किया गया है।
इसी प्रकार डांग कांदा की नवीन किस्म (छत्तीसगढ़ डांग कांदा-1) का विकास शहीद गुंडाधूर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र जगदलपुर द्वारा किया गया है। इसकी किस्म की उपज क्षमता 15 टन प्रति हेक्टेयर है तथा औसतन उपज 12-13 टन प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है यह किस्म 4-5 माह में तैयार हो जाती है। यह प्रोटिन एवं खनिज तत्व से भरपूर है एवं लम्बे समय तक इस किस्म का भण्डारित किया जा सकता है एवं इस किस्म को छत्तीसगढ़ राज्य हेतु विमोचित किया गया है। सेम की नवीन किस्म (छत्तीसगढ़ सेम-1) सेम की बैंगनी रंग की किस्म हैं। इसकी औसत उपज क्षमता 150 क्विटल प्रति हेक्टेयर है। यह लम्बी अवधि की फसल है एवं पहली तुडाई 102-106 दिन में किजा सकती हैं एवं 190-200 दिनों तक फलन होता रहता है। यह किस्म ब्लाईट एवं माहू के लिए सहनशील है। सफेद बैगन की नवीन किस्म (छत्तीसगढ़ सफेद बैगन-1) बैंगन की सफेद फल वाली किस्म है। इसकी औसत उपज क्षमता 348 क्विटल प्रति हेक्टेयर है एवं 6-7 माह की फसल होती है। फसल की पहली तुडाई 60-65 दिनों बाद किया जा सकता है। इसमें फल गुच्छो में आते हैं। यह किस्म जडविगलन रोग के लिए सहनशील है एवं इसकी खेती वर्षा काल एवं गर्मी में की जा सकती है। इस किस्म को छत्तीसगढ़ राज्य हेतु विमोचित किया गया है।

टॉक्सिकम:-100% जैविक उत्पाद जो रसायनिक खेती के दुष्प्रभावों का करेगा खात्मा

अधिकांश मानवीय बीमारियों का कारण जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ कृषि में उपयोग हो रहे रसायन भी हैं। इनमें मुख्य रूपसे मानव द्वारा उपयोग की जाने वाली विषाक्त सब्जियां, अनाज एवं फल हैं जिनकी सुरक्षा हेतु अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों व खरपतवारनाशी का उपयोग किया जाता है।

इन कीटनाशकों व खरपतवार नाशियों के अत्यधिक प्रयोग से इनके प्रति कीटों व खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है और कुछ प्रजातियों में तो प्रतिरोधक क्षमता विकसित भी हो चुकी है।इसके अलावा रासायनिक कीटनाशक अत्यधिक महगे होने के कारण किसानों को इन पर अत्यधिक खर्च करना पड़ता है। कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से फसलों, सब्जियों व फलों की गुणवत्ता पर भी विपरीत असर पड़ता है। इन वस्तुस्थिति के फलस्वरूप आज किसान भाइयों को कुछ ऐसे उत्पादों की आवश्यकता है जो रसायनिक खेती के दुष्प्रभावों को कम करें।

आज की कड़ी में हम आपको एक ऐसी ही एक कम्पनी के बारे में बताएंगे जो जैविक खेती के क्षेत्र में काफी समय से काम कर रही है औरइस कंपनी के कई जैविक उत्पाद किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है इस कम्पनी का नाम है “रामा क्रॉप साइंस”

रामा क्रॉप साइंस किसानों के लिए एक नया उत्पाद ले कर आ रहे है, जो कि 100% एक जैविक उत्पाद है, इसका नाम है “टॉक्सिकम”

टॉक्सिकम क्या है ?
टॉक्सिकम एक जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और अद्वितीय जैविक निर्माण के साथ गुणवत्ता युक्त उत्पाद है। इसमें समुद्री खरपतवार,अमीनो एसिड
होता है जो पौधे की वृद्धि को कुशलता से बढ़ाता है और ऊर्जा बढ़ाने और तनाव निवारक के रूप में कार्य करता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च फसल उपज होती है।


टॉक्सिकम के फायदे
■टॉक्सिकम, खरपतवारनाशक उपचार द्वारा पौधे में उत्पन्न शारीरिक विकार को ठीक करके पौधे के स्वस्थ विकास को प्रेरित करता है।
■ यह अच्छे बीज अंकुरण और क्लोरोफिल के संश्लेषण में मदद करता हैं।
■ यह पौधे को अच्छी ऊर्जा सहायता प्रदान करता है।
■ यह स्वस्थ पौधा बनाता है और उपज क्षमता बढ़ाता है।
■यह पौधे की सहनशीलता को बढ़ाता है और अजैविक तनाव के कारण होने वाले सभी विषाक्त प्रभावों से राहत देता है।


टॉक्सिकम का उपयोग
■40-45 मि.ली. टॉक्सिकम 15 लीटर पानी में मिलाएं।

अनुशंसित फसले
■टॉक्सिकम, बागवानी फसलों, खाद्य फसलों, नकदी फसलों, वृक्षारोपण फसलों, फूलों की खेती के साथ-साथ सभी उद्यान पौधों के लिए प्रभावी रूप से काम करता है।


निर्देश :

उपयोग करने से पहले अच्छी तरह मिलायें।
■बच्चों की पहुंच से दूर रखें।

अधिक जानकारी एवं उपलब्धता हेतु संपर्क करे।

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RAMA CROP SCIENCE PVT. LTD. 

http://www.ramacrop.com

कृषि आदान विक्रेता (डीलर्स) इसी प्रकार के अन्य उत्पादों की जानकारी एवं मूल्य से सम्बंधित जानकारी के लिए नीचे दिए गए “खेती मित्र” के वैबसाइट पर अवश्य विजिट करे।

http://www.khetimitra.com

जाने एक प्रामाणित जैविक उत्पाद “PLANT’S EXI LIR” के बारे में।

PLANT’S EXI LIR” ” कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण मंत्रालय नई दिल्ली -भारत सरकार द्वारा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में संचालित कृषि नवाचार एवं कृषि व्यवसाय हेतु RKVVY-RAFTAAR – UDBHAV-2019 के अंतर्गत उत्पादित उत्पाद PLANT’S EXI LIR” राष्ट्रीय स्तर की संस्था ECOCERT INDIA PVT.LTD से प्रमाणित उत्पाद है।

योगेश सोनकर ने Nature wall Biotech pvt ltd की स्थापना की जो Department of Promotion of Industry and Internal Tread (DIPPT),(Govt.of India) recognized startup है।

इस कंपनी के फाउंडर-डारेक्टर वे स्वयं है और यह कंपनी इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय रायपुर में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) Rafraar Agribusiness Incubator (IGKV R-ABI) योजना में इक्यूबेट है।

योगेश सोनकर बताते है कि प्रायः छत्तीसगढ़ के किसान भाई बीजो का उपचार किये बिना ही बीजो की बुवाई कर देते है जिससे बाद में बीज जनित रोगों से किसान भाई परेशान रहते है एवं अंधाधुन्ध रसायनिक दवाओं का उपयोग इन रोगों के उपचार में करते है।जिसके कारण उत्पादन भी काफी प्रभावित होता है और स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों को आमंत्रित करते है। ऐसे में जरूरत है जैविक उत्पादों के प्रयोग की। उनमें से एक है “”PLANT’S EXI LIR”” “जो कि पूर्णतः जैविक है।

जानिए कैसे उपयोग में लाया जा सकता है PLANT’S EXI LIR”

कैसे करे PLANT’S EXI LIR” से बीजोपचार
धान के बीजो का बीजोपचार करने के लिए धान के बीजो को प्लास्टिक के शीट में डालकर फैला लेंवे। प्रति किलो बीज के लिए PLANT’S EXI LIR” 5 ग्राम की मात्रा में लेकर उसमें इतना पानी मिलावे की पेस्ट बना जाए पेस्ट को बीजो पर छिड़ककर पेस्ट के साथ बीजो को रगड़ने से काले रंग की परत बीजो पर चढ़ जाएगी अगर बीजो पैर PLANT’S EXI LIR” पाउडर स्वरूप में दिख रहा हो तो उसमें थोड़ा और पानी मिलाकर रगड़ने की आवश्यकता है। कब बीजो को छायादार जगह पर सूखा लेंवे। और अब बुवाई के लिए प्रयोग करे।


खाद में मिलाकर भी प्रयोग कर सकते है।

पहली बार खाद डालते समय खाद में 500 ग्राम PLANT’S EXI LIR”” प्रति एकड़ के हिसाब से डालने पर 8 से 10 दिन में स्प्ष्ट रूप से प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देने लगता है।

ये काम करता है” “PLANT’S EXI LIR”

1.मिटटी को उपजाऊ बना देता है, मिटटी में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ा देता है।

2. मिटटी में केंचुए काम करना सुरु कर देते है।

3.फसल को मिटटी से होनेवाले सभी रोगों से मुक्ति दिलाता है। का उपयोग फसल की प्रारंभिक अवस्था अथवा आधार खाद के साथ मिलाकर उपयोग करने से खाद की उपयोगिता को बढाता है। इसके क्षरण को रोककर पौधों के लिए भरपूर भोजन उपलब्ध करता है |


5. यह सम्पूर्ण जाइम का कार्य करता है | इसके उपयोग के पश्चात् अलग के किसी प्रकार के जाइम की आवश्यकता नहीं है |

PLANT’S EXI LIR” उपयोग से लाभ :-
1. पोधे के भोजन ग्रहण करने वाली जड़ो का विकास करता है तथा पौधे की बढवार में सहायक।
2. पौधे में संतुलित नाइट्रोजन ग्रहण तथा भूमि में उपस्थित नाइट्रोजन की उपयोगिता को बढाता है ।
3. भूमि में उपस्थित पोटाश, कैल्शियम तथा फास्फोरस को पौधे के लिए उपलब्ध कराता है ताकि पौधे, जड़ो के माध्यमसे आसानी से ग्रहण कर सके ।
4. पौधे में संतुलित पोषक तत्वों को भोजन के रूप में उपलब्ध कराता है तथा विपरीत परिस्थिति अथवा ओवर दोस होने पर इसके विपरीत प्रभाव को कम करता है ।
5. पौधे में प्राकृतिक रूप से रोग तथा कीट प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है।
6. भूमि की उर्वरा शक्ति को बढाता है तथा खाद एवं अन्य क्षरण को कम करता है और जल धारण क्षमता को बढाता है ।
7. अंकुरण क्षमता को बढाता है तथा भूमि के पी.एच. को न्यूट्रल करता है।

PLANT’S EXI LIR” के उपयोग की विधि :-
1. लगभग सभी प्रकार के जैविक एवं रासायनिक खाद के साथ मिलाकर उपयोग किया जा सकता है |
2. सिस्टमिक कीटनाशक एवं कैल्शियम नाइट्रेट के साथ न मिलाये |
3. सभी घुलनशील खाद के साथ मिलाकर भी उपयोगकिया जा सकता है |


PLANT’S EXI LIR” की मात्रा :-
1. आधार खाद के साथ मिलाकर डालने के लिए 500 ग्राम प्रति एकड़ |
2. स्प्रे के व्दारा : 250 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी के साथ मिलाकर
3. ड्रीप के व्दारा : 250 ग्राम प्रत्येक बार घुलनशील खाद के साथ मिलाकर देना उचित है |

Nature wall Biotech pvt ltd कम्पनी के अन्य उत्पाद

उपलब्धता
अधिक जानकारी हेतु इस नम्बर में संपर्क करें…91797 85330

सौर सुजला योजना:-सौर पम्पों से बदलेंगे नजारे लहलहायेंगे खेत हमारे।

सौर सुजला योजना के तहत राज्य सरकार छत्तीसगढ़ में किसानों को सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई पंप प्रदान करेगा जिससे वे अपनी भूमि पर कृषि व सिंचाई कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के ऐसे खेत जहां बिजली की सुविधा नही है वैसे खेत के किसान सौर सुजला योजना का लाभ ले सकते है।छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश के किसान के लिए सौर सुजला योजना छत्तीसगढ़ 2020 (Saur Sujala Yojana CG) शुरू की है। जिसमें किसानों को ट्यूबवेल चलाने के लिए सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई पंप पर अनुदान दे रही है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को कम कीमत पर सोलर पंप उपलब्ध करना है, राज्य के कई जिलों के खेतों में ट्यूबवेल के माध्यम से सिंचाई करने के लिए बिजली नहीं है। और सौर ऊर्जा संचालित सिंचाई पंप की कीमत अधिक होने के कारण गरीब किसान नहीं खरीद सकतें हैं। उन किसानों को सरकार योजना के माध्यम से रियायती दारों पर सोलर पम्प उपलब्ध करा रही है।

योजना के तहत वितरित सोलर पम्पों के प्रकार

सौर सुजला योजना के तहत लाभार्थियों को 2 तरह के सोलर पंप वितरित किये जायेंगे। इन सोलर पम्पों की क्षमता और विन्यास अलग -2 होगा। इनमे से पहला सोलर पंप 3HP का है। यह छोटे पैमाने के किसानों के लिए उनकी सिंचाई गतिविधियों के प्रदर्शन के लिए फायदेमंद हो सकता है। दूसरा सोलर पंप 5HP का है जिसकी क्षमता अधिक है और यह ज्यादा पानी को पंप कर सकता है। यह माध्यम से उच्च पैमाने के किसानों के लिए उनकी सिंचाई गतिविधियों के प्रदर्शन के लिए फायदेमंद हो सकता है। ये दोनों ही सोलर पंप अत्यधिक कुशल हैं और क्रेडा द्वारा इन पम्पों के स्थापना और रख-रखाव में तकनीकी सहायता दिया जाता है।

आवश्यक दस्तावेज

■आवेदन पत्र

■बोर के साथ हितग्राही का फोटो

■नक्शा खसरा बी1

■ऋण पुस्तिका की छाया प्रति

■बैंक पासबुक की छायाप्रति

■जाति प्रमाण पत्र

■आधार कार्ड की छायाप्रति

■मोबाइल नम्बर

इस योजना के लिए कृषि विभाग में हितग्राही अपना आवेदन जमा कर सकते है।

आवेदन का पंजीकरण कैसे करें

इस योजना के लाभार्थियों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार का कृषि विभाग मुख्य पंजीयन प्राधिकरण है। किसान आवेदन करने के लिए मुक्त है पर रियायती दरों में सोलर पंप बांटने के लिए योग्य पात्रों को चयन कृषि विभाग द्वारा किया जायेगा। इस योजना के लिए आवेदन पत्र ब्लॉक कार्यालयों और कृषि कार्यालयों में उपलब्ध है। आवेदन को ठीक से भर कर आवश्यक दस्तावेजों के साथ केवल कृषि कार्यालयों में प्रस्तुत करना होगा। 

आवेदन प्राप्त होने के बाद क्रेडा द्वारा जांच की जाती है की आवेदक इस योजना के लिए योग्य पात्र है या नही।CG Solar Sujala Yojana 2020 तहत राज्य सरकार 3HP & 5HP क्षमता वाले सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंप पर अनुदान दे रही है। जिससे किसान कृषि करने के लिए प्रेरित हो और किसान की अच्छी पैदावार हो सके जिससे उसकी अच्छी आमदनी हो और किसान की परिवारिक आर्थिक, सामाजिक स्तर ऊपर उठ सके।योजना का लाभ लेने के लिए आपको Saur Sujala Yojana PDF Form डाउनलोड कर सकते है।

https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://www.creda.in/&ved=2ahUKEwjKk9nw7ODtAhWczDgGHRrWAtMQFjAGegQIDBAB&usg=AOvVaw1JfGgnv9CksbwD6XjGUVOU&cshid=1608615510472

कैसे बनाएं जैविक खाद

जैविक खाद से सम्बंधित सभी जानकारी को शोर्ट url करके एक पोस्ट बनाई गयी है , आशा करते है आप सभी के लिए उपयोगी होगी….

कम्पोस्ट खाद : – http://goo.gl/suJa8R
कम्पोस्ट खाद : – http://goo.gl/z64fOL
मटका खाद : – http://goo.gl/RH3Cjq
जीवामृत: – http://goo.gl/PeBSZq
जीवामृत: – http://goo.gl/rCG7My
घन जीवामृत :- http://goo.gl/AmlUQt
पंचगव्य : – http://goo.gl/XrKIQm
केंचुआ खाद:- http://goo.gl/fjHvww
केंचुआ खाद:- http://goo.gl/3S3Q18
केंचुआ खाद:- http://goo.gl/VXdBG8
वर्मी वाश : – http://goo.gl/S2z7MZ
वर्मी वाश : – http://goo.gl/zpaJZU
हरी खाद:- http://goo.gl/0D7BnV
हरी खाद:- http://goo.gl/NLaIk8
हरी खाद:- http://goo.gl/uV3UXA
नाडेप विधि:- http://goo.gl/Oqhavo
सींग खाद (बी.डी500) :- http://goo.gl/j3CTS5
सींग खाद (बी.डी500) :- http://goo.gl/bsbqup
सी.पी.पी :- http://goo.gl/cf6ZdS
सी.पी.पी :- http://goo.gl/ZMQ71Y
गोबर गैस स्लरी खाद :- http://goo.gl/PRGCvJ
गोबर गैस स्लरी खाद :- http://goo.gl/4ZWoYB
जैव उर्वरक :- http://goo.gl/oDUV3U
जैव उर्वरक :- http://goo.gl/tdn9YC
जैव उर्वरक :- http://goo.gl/MXGwKe
पौध बढवार टॉनिक :- http://goo.gl/AYvWIJ


मटका खाद

देशी गाय का 10 लीटर गौमूत्र , 10 किलोग्राम ताजा गोबर, आधा किलोग्राम गुड , आधा किलो चने का बेसन सभी को मिलाकर 1 बड़े मटके में भरकर 5-7 दिन तक सडाएं इससे उत्तम जीवाणु कल्चर तैयार होता है. मटका खाद को 200 लीटर पानी में घोलकर किसी भी फसल में गीली या नमीयुक्त जमीन में फसलों की कतारों के बीच में अच्छी तरह से प्रति एकड़ छिडकाव करें . हर 15 दिन बाद इस क्रिया को दोहराएं . इस तरह फसल भी अच्छी होगी , पैदावार भी बढ़ेगी , जमीन भी सुधरेगी और किसी भी तरह के खाद की आवश्यकता नहीं पड़ेगी . इस तरह से किसान आत्मनिर्भर होकर बाजार मुक्त खेती कर सकता है और जहरमुक्त , रसायन मुक्त स्वादिष्ट और पौष्टिक फसल तैयार कर सकता है .

इस मटका खाद को सिंचाई जल के साथ सीधे भूमि उप अथवा टपक (ड्रिप) सिंचाई से भी दिया जा सकता है (1 मटका प्रति एकड़) एक मटका खाद को 400 लीटर पानी में अच्छे से घोलकर इस विलयन को पौधे के पास जमीन पर देने से अच्छे परिणाम मिलते है. यदि इसी विलयन को सूती कपड़े से छानकर फसलों पर छिड़कते है तो अधिक फूल व् फल लगते है

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जीवामृत

(अ) घन जीवामृत (एक एकड़ खेत के लिए)

सामग्री :-

  1. 100 किलोग्राम गाय का गोबर
  2. 1 किलोग्राम गुड/फलों का गुदा की चटनी
  3. 2 किलोग्राम बेसन (चना, उड़द, अरहर, मूंग)
  4. 50 ग्राम मेड़ या जंगल की मिट्टी
  5. 1 लीटर गौमूत्र

बनाने की विधि :-
सर्वप्रथम 100 किलोग्राम गाय के गोबर को किसी पक्के फर्श व पोलीथीन पर फैलाएं फिर इसके बाद 1 किलोग्राम गुड या फलों गुदों की चटनी व 1 किलोग्राम बेसन को डाले इसके बाद 50 मेड़ या जंगल की मिट्टी डालकर तथा 1 लीटर गौमूत्र सभी सामग्री को फॉवड़ा से मिलाएं फिर 48 घंटे छायादार स्थान पर एकत्र कर या थापीया बनाकर जूट के बोरे से ढक दें। 48 घंटे बाद उसको छाए पर सुखाकर चूर्ण बनाकर भंडारण करें।
अवधि प्रयोग :- इस घन जीवामृत का प्रयोग छः माह तक कर सकते हैं।

सावधानियां :-
सात दिन का छाए में रखा हुआ गोबर का प्रयोग करें।
गोमूत्र किसी धातु के बर्तन में न ले या रखें।
छिड़काव :- एक बार खेत जुताई के बाद घन जीवामृत का छिड़काव कर खेत तैयार करें।
(ब) जीवामृत : (एक एकड़ हेतु)
सामग्री :-

  1. 10 किलोग्राम देशी गाय का गोबर
  2. 5 से 10 लीटर गोमूत्र
  3. 2 किलोग्राम गुड या फलों के गुदों की चटनी
  4. 2 किलोग्राम बेसन (चना, उड़द, मूंग)
  5. 200 लीटर पानी
  6. 50 ग्राम मिट्टी

बनाने की विधि:-

सर्वप्रथम कोई प्लास्टिक की टंकी या सीमेंट की टंकी लें फिर उस पर 200 ली. पानी डाले। पानी में 10 किलोग्राम गाय का गोबर व 5 से 10 लीटर गोमूत्र एवं 2 किलोग्राम गुड़ या फलों के गुदों की चटनी मिलाएं। इसके बाद 2 किलोग्राम बेसन, 50 ग्राम मेड़ की मिट्टी या जंगल की मिट्टी डालें और सभी को डंडे से मिलाएं। इसके बाद प्लास्टिक की टंकी या सीमेंट की टंकी को जालीदार कपड़े से बंद कर दे। 48 घंटे में चार बार डंडे से चलाएं और यह 48 घंटे बाद तैयार हो जाएगा।
अवधि प्रयोग : इस जीवामृत का प्रयोग केवल सात दिनों तक कर सकते हैं।

सावधानियां :-
प्लास्टिक व सीमेंट की टंकी को छाए में रखे जहां पर धूप न लगे।
गोमूत्र को धातु के बर्तन में न रखें।
छाए में रखा हुआ गोबर का ही प्रयोग करें।

छिड़काव:-
जीवामृत को जब पानी सिंचाई करते है तो पानी के साथ छिड़काव करें अगर पानी के साथ छिड़काव नहीं करते तो स्प्रे मशीन द्वारा छिड़काव करें।
पहला छिड़काव बोआई के 15 से 21 दिन बाद 5 ली. छना जीवामृत 100 ली. पानी में घोल कर।
दूसरा छिड़काव बोआई के 30 से 45 दिन बाद 5 ली. छना जीवामृत 100 ली. पानी में घोल कर।
तीसरा छिड़काव बोआई के 45 से 60 दिन बाद 10 ली. छना जीवामृत 150 ली. पानी में घोल कर।
60 से 90 दिन की फसलों में :-
चौथा छिड़काव बोआई के 60 से 75 दिन बाद 20 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोल कर
90 से 180 दिन की फसलों में:-
चौथा छिड़काव बोआई के 60 से 75 दिन बाद 10-15 ली. छना जीवामृत 150 ली. पानी में घोल कर। पांचवा छिड़काव बोआई के 75 से 0 दिन बाद 20 ली. छना जवामृत 200 ली. पानी में घोल कर।
छठा छिड़काव बोआई के 90 से 120 दिन बाद 20 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोल कर।
सातवां छिड़काव बोआई के 105 से 150 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोल कर।
आठवां छिड़काव बोआई के 120 से 165 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोल कर। नौवां छिड़काव बोआई के 135 से 180 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोल कर।
दसवां छिड़काव बोआई के 150 से 200 दिन बाद 30 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोल कर।

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घन जीवामृत

घन जीवामृत, जीवाणुयुक्त सूखी खाद है जिसे बुवाई के समय या पानी के तीन दिन बाद भी दे सकते हैं। बनाने की विधि इस प्रकार है – गोबर 100 किलो, गुड़ 1 किलो, आटा दलहन 1 किलो, मिट्टी जीवाणुयुक्त 100 ग्राम उपर्युक्त सामग्री में इतना गौमूत्र (लगभग 5 ली0) मिलायें जिससे हलवा/पेस्ट जैसा बन जाये, इसे 48 घंटे छाया में बोरी से ढ़ककर रखें। इसके बाद छाया में ही फैलाकर सुखा लें फिर बारीक करके बोरी में भरें। इसका 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं। एक एकड़ खेत में 1 कुन्तल तैयार घन जीवामृत देना चाहिए।

घन जीवामृत (एक एकड़ खेत के लिए)
सामग्री :-

  1. 100 किलोग्राम गाय का गोबर
  2. 1 किलोग्राम गुड/फलों का गुदा की चटनी
  3. 2 किलोग्राम बेसन (चना, उड़द, अरहर, मूंग)
  4. 50 ग्राम मेड़ या जंगल की मिट्टी
  5. 1 लीटर गौमूत्र
    बनाने की विधि :-
    सर्वप्रथम 100 किलोग्राम गाय के गोबर को किसी पक्के फर्श व पोलीथीन पर फैलाएं फिर इसके बाद 1 किलोग्राम गुड या फलों गुदों की चटनी व 1 किलोग्राम बेसन को डाले इसके बाद 50 मेड़ या जंगल की मिट्टी डालकर तथा 1 लीटर गौमूत्र सभी सामग्री को फॉवड़ा से मिलाएं फिर 48 घंटे छायादार स्थान पर एकत्र कर या थापीया बनाकर जूट के बोरे से ढक दें। 48 घंटे बाद उसको छाए पर सुखाकर चूर्ण बनाकर भंडारण करें।
    अवधि प्रयोग :- इस घन जीवामृत का प्रयोग छः माह तक कर सकते हैं।
    सावधानियां :-
    सात दिन का छाए में रखा हुआ गोबर का प्रयोग करें।
    गोमूत्र किसी धातु के बर्तन में न ले या रखें।
    छिड़काव :- एक बार खेत जुताई के बाद घन जीवामृत का छिड़काव कर खेत तैयार करें।

पंचगव्य

प्राचीन काल से ही भारत जैविक आधारित कृषि प्रधान देश रहा है। हमारे ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख किया गया है। पंचगव्य का अर्थ है पंच+गव्य (गाय से प्राप्त पाँच पदार्थों का घोल) अर्थात गौमूत्र, गोबर, दूध, दही, और घी के मिश्रण से बनाये जाने वाले पदार्थ को पंचगव्य कहते हैं। प्राचीन समय में इसका उपयोग खेती की उर्वरक शक्ति को बढ़ाने के साथ पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता था।

विशेषतायें

i. भूमि में जीवांशों (सूक्ष्म जीवाणुओं) की संख्या में वृद्धि
ii. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि
iii. फसल उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता में वृद्धि
iv. भूमि में हवा व नमी को बनाये रखना
v. फसल में रोग व कीट का प्रभाव कम करना
vi. स्थानीय संसाधनों पर आधारित
vii. सरल एवं सस्ती तकनीक पर आधारित

पंचगव्य बनाने की विधि

प्रथम दिन 2.5 कि.ग्रा. गोबर व 1.5 लीटर गोमूत्र में 250 ग्राम देशी घी अच्छी तरह मिलाकर मटके में डाल दें व ढक्कन अच्छी तरह से बंद कर दें। अगले तीन दिन तक इसे रोज हाथ से हिलायें। अब चौथे दिन सारी सामग्री को आपस में मिलाकर मटके में डाल दें व फिर से ढक्कन बंद कर दें। अगले दिन इसे लकड़ी से हिलाने की प्रक्रिया शुरू करें और सात दिन तक प्रतिदिन दोहराएँ। इसके बाद जब इसका खमीर बन जाय और खुशबू आने लगे तो समझ लें कि पंचगव्य तैयार है। इसके विपरीत अगर खटास भरी बदबू आए तो हिलाने की प्रक्रिया एक सप्ताह और बढ़ा दें। इस तरह पंचगव्य तैयार होता है अब इसे 10 ली. पानी में 250 ग्रा. पंचगव्य मिलाकर किसी भी फसल में किसी भी समय उपयोग कर सकते हैं। अब इसे खाद, बीमारियों से रोकथाम, कीटनाशक के रूप में व वृद्धिकारक उत्प्रेरक के रूप में उपयोग कर सकते हैं। इसे एक बार बना कर 6 माह तक उपयोग कर सकते हैं। इसको बनाने की लागत 70 रु. प्रति लीटर आती है।

उपयोग विधि

i. पंचगव्य का उपयोग अनाज व दालों (धान, गेहूँ, मंड़ुवा, राजमा आदि) तथा सब्जियों (शिमला मिर्च, टमाटर, गोभी वर्गीय व कन्द वाली) में किया जाता है।
ii. छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी आवश्यक है।
iii. बीज उपचार से लेकर फसल कटाई के 25 दिन पहले तक 25 से 30 दिन के अन्तराल में इसका उपयोग किया जा सकता है।
iv. प्रति बीघा 5 ली. पंचगव्य 200 ली. पानी में मिलाकर पौधों के तनों के पास छिड़काव करें।

बीज उपचार

i. 1 लीटर पंचगव्य के घोल में 500 ग्राम वर्मी कम्पोस्ट मिलाकर बीजों पर छिड़काव करें और उसकी हल्की परत बीज पर चढ़ायें व 30 मिनट पर छाया में सुखाकर बुआई करें।

पौध के लिए

i. पौधशाला से पौध निकाल कर घोल में डुबायें और रोपाई करें।
ii. पौधा रोपण या बुआई के पश्चात 15-25 दिन के अन्तराल पर 3 बार लगातार छिड़काव करें।

सावधानियाँ

i. पंचगव्य का उपयोग करते समय खेत में नमी का होना आवश्यक है।
ii. एक खेत का पानी दूसरे खेतों में नहीं जाना चाहिए।
iii. इसका छिड़काव सुबह 10 बजे से पहले तथा शाम 3 बजे के बाद करना चाहिए।
iv. पंचगव्य मिश्रण को हमेशा छायादार व ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए।
v. इसको बनाने के 6 माह तक इसका प्रयोग अधिक प्रभावशाली रहता है।
vi. टीन, स्टील व ताम्बा के बर्तन में इस मिश्रण को नहीं रखना चाहिए। इसके साथ रासायनिक कीटनाशक व खाद का उपयोग नहीं करना चाहिए।
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जैव उर्वरक
जैव उवर्रकों का फसलों/सब्जियों में उपयोग एवं लाभ

आज कृषि उत्पादन को लगातार बढ़ाना कृषि वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। सघन खेती से मृदा में पोषक तत्व धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। इस कमी को रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से पूरा किया जाता है। अधिकांश किसान संतृप्त मात्रा में रासायनिक खाद के उपयोग के बावजूद इष्टतम उत्पादन लेने से वंचित हैं। अतः रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से होने वाला लाभ घटता जा रहा है। साथ ही मृदा स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर दिखाई पड़ रहा है, जिससे देश में स्थाई खेती हेतु खतरा पैदा हो रहा है। फसलों द्वारा भूमि से लिये जाने वाले प्राथमिक मुख्य पंोषक तत्वों- नत्रजन, सुपर फास्फेट एवं पोटाश में से नत्रजन का सर्वाधिक अवशोषण होता है क्योंकि इस तत्व की सबसे अधिक आवश्यकता होती है और शेष 55-60 प्रतिशत भाग या तो पानी के साथ बह जाता है या वायुमण्डल में डिनाइट्रीफिकेशन से मिल जाता है या जमीन में ही अस्थायी बन्धक हो जाते ंै है! वर्तमान परिस्थितियों में नत्रजनधारी उर्वरकों के साथ-साथ नत्रजन के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग न केवल आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि मृदा की उर्वरा शक्ति को टिकाऊ रखने के लिये भी आवश्यक है। ऐसी स्थिति में जैव उर्वरकों का प्रयोग करना एकमात्र विकल्प के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। जैव उर्वरकों को बीजोत्पादन कार्यक्रम मे लेने पर 20 प्रतिशत तक उपज में वृद्धि पाई गई है।

जैव उर्वरक क्या है ?

जैव उर्वरक विशिष्ट प्रकार के जीवाणुओं का एक विशेष प्रकार के माध्यम, चारकोल, मिट्टी या गोबर की खाद में ऐसा मिश्रण है, जो वायुमण्डलीय नत्रजन को साइकल द्वारा पौधों को उपलब्ध कराती है या मिट्टी में उपलब्ध अघुलनशील फास्फोरस को घुलनशील अवस्था मे परिवर्तित करके पौधों को उपलब्ध कराता है। इनके प्रयोग से रासायनिक उर्वरकों की 1/3 मात्रा तक की बचत हो जाती है।

जैव उर्वरकों का वर्गीकरण:

नाइट्रोजन पूर्ति करने वाले जैव उर्वरक यह जीवाणु सभी दलहनी फसलों व तिलहनी फसलों जैसे- सोयाबीन और मूँगफली की जड़ों में छोटी-छोटी ग्रन्थियों में पाया जाता है, जो सह जीवन के रूप में कार्य करते हुए वायुमण्डल में उपलब्ध नाइट्रोजन को पौधों को उपलब्ध कराता है। राइजोबियम जीवाणु अलग-अलग फसलों के लिये अलग-अलग होता है इसलिये बीज उपचार हेतु उसी फसल का कल्चर प्रयोग करना चाहिये।

जैव उर्वरकों से बीज उपचार करने की विधि:

जैव उर्वरकों के प्रयोग की यह सर्वोत्तम विधि है। 1 लीटर पानी में लगभग 100 ग्राम गुड़ डालकर उबालकर अच्छी तरह मिलाकर घोल बना लेते हैं। इस घोल को बीजों पर छिड़क कर मिला देते हैं जिससे प्रत्येक बीज पर इसकी परत चढ़ जाये !इसके उपरान्त बीजो को छायादार जगह में सुखा लेते हैं। उपचारित बीजों की बुवाई सूखने के तुरन्त बाद कर देनी चाहिये।

पौध जड़ उपचार विधि:

धान तथा सब्जी वाली फसलें, जिनके पौधों की जड़ों को जैव उर्वरकों द्वारा उपचारित किया जाता है। इसके लिये बर्तन में 5-7 लीटर पानी में एक किलोग्राम जैव उर्वरक मिला लेते हैं। इसके उपरान्त नर्सरी से पौधों को उखाड़कर तथा जड़ों से मिट्टी साफ करने के पश्चात 50-100 पौधों को बण्डल में बाँधकर जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबो देते हैं। इसके बाद तुरन्त रोपाई कर देते हैं।

कन्द उपचार विधि: गन्ना, आलू, अदरक, घुइयाँ जैसी फसलों में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों को

उपचारित किया जाता है। एक किलोग्राम जैव उर्वरक को 20-30 लीटर घोलकर मिला देते हैं। इसके उपरान्त कन्दों को 10 मिनट तक घोल में डुबोकर रखने के पश्चात बुवाई कर देते हैं।

मृदा उपचार विधि: 4-5 किलोग्राम जैव उर्वरक 50-60 कि.ग्रा. मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण तैयार करके प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की अन्तिम जुताई पर खेत में मिला देते हैं।

जैव उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियाँ:

जैव उर्वरक को हमेशा धूप या गर्मी से बचा कर रखना चाहिये। कल्चर पैकेट उपयोग के समय ही खोलना चाहिये। कल्चर द्वारा उपचारित बीज, पौध, मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण छाया में ही रखना चाहिये। कल्चर प्रयोग करते समय उस पर उत्पादन तिथि, उपयोग की अन्तिम तिथि, फसल का नाम आदि अवश्य लिखा देख लेना चाहिये। निश्चित फसल के लिये अनुमोदित कल्चर का उपयोग करना चाहिये।

जैव उर्वरकों के प्रकार:

जैव उर्वरक निम्न प्रकार के उपलब्ध हैं:-

राइजोबियम कल्चर
एजोटोबैक्टर कल्चर
एजोस्पाइरिलम कल्चर
नीलहरित शैवाल
फास्फेटिक कल्चर
1.राइजोबियम कल्चर: यह एक सहजीवी जीवाणु है जो पौधो की जडों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके उसे पौधों के लिए उपलब्ध कराती है! यह खाद दलहनी फसलों में प्रयोग की जा सकती है तथा यह फसल विशिष्ट होती है, अर्थातअलग-अलग फसल के लिये अलग-अलग प्रकार का राइजोबियम जीवाणु खाद का प्रयोग होता है। राइजोबियम जीवाणु खाद से बीज उपचार करने पर ये जीवाणु खाद से बीज पर चिपक जाते हैं। बीज अंकुरण पर ये जीवाणु जड़ के मूलरोम द्वारा पौधों की जड़ों में प्रवेश कर जड़ों पर ग्रन्थियों का निर्माण करते हैं।

फसल विशिष्ट पर प्रयोग की जाने वाली राइजोबियम कल्चर:

दलहनी फसलें:मूँग, उर्द, अरहर, चना, मटर, मसूर; मटर; लोबिया; राजमा; मेथी इत्यादि।

तिलहनी फसलें: मूँगफली, सोयाबीन। अन्य फसलें: बरसीम, ग्वार आदि।

  1. एजोटोबैक्टर कल्चर: यह जीवाणु खाद में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से रहने वाले जीवाणुओं

का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। यह जीवाणु खाद दलहनी फसलों को छोड क़र सभी फसलों पर उपयोग में लायी जा सकती है। इसका प्रयोग सब्जियों जैसे- टमाटर; बैंगन; मिर्च; आलू; गोभीवर्गीय सब्जियों मे किया जाता है!

  1. एजोस्पाइरिलम कल्चर: यह जीवाणु खाद भी मृदा में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से रहने

वाले जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। यह जीवाणु खाद धान, गन्ने;मिर्च; प्याज आदि फसल हेतु विशेष उपयोगी है।

  1. नील हरित शैवाल खाद: एक कोशिकीय सूक्ष्म नील हरित शैवाल नम मिट्टी तथा स्थिर पानी में स्वतन्त्र रूप से रहते हैं। धान के खेत का वातावरण नील हरित शैवाल के लिये सर्वथा उपयुक्त होता है। इसकी वृद्धि के लिये आवश्यक ताप, प्रकाश, नमी और पोषक तत्वों की मात्रा धान के खेत में विद्य़मान रहती है।

प्रयोगविधि: धान की रोपाई के 3-4 दिन बाद स्थिर पानी में 12.5 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से सूखे जैव उर्वरक का प्रयोग करें। इसे प्रयोग करने के पश्चात 4-5 दिन तक खेत में लगातार पानी भरा रहने दें। इसका प्रयोग कम से कम तीन वर्ष तक लगातार खेत में करें। इसके बाद इसे पुनः डालने की आवश्यकता नहीं होती। यदि धान में किसी खरपतवारनाशी का प्रयोग किया है तो इसका प्रयोग खरपतवारनाशी के प्रयोग के 3-4 दिन बाद ही करें।

  1. फास्फेटिक कल्चर: फास्फेटिक जीवाणु खाद भी स्वतन्त्रजीवी जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप में उत्पाद है। नत्रजन के बाद दूसरा महत्वपूर्ण पोषक तत्व फास्फोरस है, जिसे पौधे सर्वाधिक उपयोग में लाते हैं। फास्फेटिक उर्वरकों का लगभग एक-तिहाई भाग पाध्ै ो अपने उपयोग मे ं ला पाते ह।ंै शेष घुलनशील अवस्था में ही जमीन में ही पड़ा रह जाता है, जिसे पौधे स्वयं घुलनशील फास्फोरस को जीवाणुओं द्वारा घुलनशील अवस्था में बदल दिया जाता है तथा इसका प्रयोग सभी फसलों में किया जा सकता है।

फास्फेटिक कल्चर की प्रयोग विधि: फास्फेटिक कल्चर या पी.एस.बी. कल्चर का प्रयोग रोपा लगाने के पूर्व धान पौध की जड़ों या बीज को बोने के पहले उपचारित किया जाता है। बीज उपचार हेतु 5-10 ग्राम कल्चर/किलोग्राम बीज दर से उपचारित करें। रोपा पद्धति में धान की जड़ों को धोने के बाद 300-400 ग्राम कल्चर के घोल में डुबाकर निथार लें, बाद में रोपाई करें। पी.एस.बी. कल्चर का भूमि में सीधे उपयोग की अपेक्षा बीजोपचार या जड़ों का उपचार अधिक लाभकारी होता है।

जैव उर्वरकों के उपयोग से लाभ:

इसके प्रयोग सं फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है।
रासायनिक उवर्रक एवं विदशी मुद्रा की बचत होती है।
ये हानिकारक या विषैले नही होते !
मृदा को लगभग 25-30 कि.ग्रा./हे. नाइट्रोजन एवं 15-20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर फास्फोरस उपलब्ध कराना तथा मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशाओं में सुधार लाना।
इनके प्रयोग से उपज में वृद्धि के अतिरिक्त गन्ने में शर्करा की, तिलहनी फसलों में तेल की तथा मक्का एवं आलू में स्टार्च की मात्रा में बढ़ोतरी होती है।
विभिन्न फसलों में बीज उत्पादन कार्यक्रम द्वारा 15-20 प्रतिशत उपज में वृद्धि करना।
किसानों को आर्थिक लाभ होता है।
इनसे बीज उपचार करने से अंकुरण शीघ्र होता है तथा कल्लों की संख्या में वृद्धि होती है।

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