कृषि मंत्रालय भारत सरकार एवं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़िया कृषि छात्र ने बनाया एक जैविक उत्पाद “ROOT RISE”

जैविक उत्पाद “ROOT RISE”

योगेश सोनकर तहसील धमधा जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ के निवासी है के एवं कृषि के छात्र है। योगेश सोनकर के स्टार्टअप ने एसोचैम स्टार्टअप लॉन्च पैडकॉम्पिटीशन के फाइनल राउंड में जगह बनाने में गत वर्ष कामयाबी हासिल की थी। इसका फाइनल राउंड अक्टूबर-नवंबर में गुजरात या दिल्ली में होना था।

परन्तु कोरोना संक्रमण के खतरे की वजह से डेट और स्थान तय नहीं पाया। जोनल लेवल कॉम्पिटीशन में लगभग 100 स्टार्टअप को पीछे छोड़कर योगेश के स्टार्टअप ने फाइनल में जगह बनाई थी । फाइनल राउंड में लगभग 15 स्टार्टअप ही शामिल होंते।कॉम्पिटीशन में इन्वेस्टर भी शामिल होते। विनर्स को बिजनेस बढ़ाने के लिए डेढ़ करोड़ तक की फंडिंग मिल सकती हैं।

योगेश सोनकर ने एक नया जैव उत्पाद बनाया है जिसका नाम है।“ROOT RISE”

योगेश सोनकर
केंद्रीय कृषि मंत्री माननीय नरेंद्र सिंह तोमर के साथ योगेश सोनकर

” ROOT RISE ” कृषि सहकारिता एवं किसान कल्याण मंत्रालय नई दिल्ली -भारत सरकार द्वारा इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में संचालित कृषि नवाचार एवं कृषि व्यवसाय हेतु RKVVY-RAFTAAR – UDBHAV-2019 के अंतर्गत उत्पादित उत्पाद ROOT – RISE राष्ट्रीय स्तर की संस्था ECOCERT INDIA PVT.LTD से प्रमाणित उत्पाद है।

योगेश सोनकर ने Nature wall Biotech pvt ltd की स्थापना की जो Department of Promotion of Industry and Internal Tread (DIPPT),(Govt.of India) recognized startup है।

इस कंपनी के फाउंडर-डारेक्टर वे स्वयं है और यह कंपनी इंदिरा गांधी कृषि विश्व विद्यालय रायपुर में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) Rafraar Agribusiness Incubator (IGKV R-ABI) योजना में इक्यूबेट है।

योगेश सोनकर बताते है कि प्रायः छत्तीसगढ़ के किसान भाई बीजो का उपचार किये बिना ही बीजो की बुवाई कर देते है जिससे बाद में बीज जनित रोगों से किसान भाई परेशान रहते है एवं अंधाधुन्ध रसायनिक दवाओं का उपयोग इन रोगों के उपचार में करते है।जिसके कारण उत्पादन भी काफी प्रभावित होता है और स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों को आमंत्रित करते है। ऐसे में जरूरत है जैविक उत्पादों के प्रयोग की। उनमें से एक है ROOT- RISE जो कि पूर्णतः जैविक है।

जानिए कैसे उपयोग में लाया जा सकता है “ROOT RISE”

कैसे करे ROOT- RISE से बीजोपचार
धान के बीजो का बीजोपचार करने के लिए धान के बीजो को प्लास्टिक के शीट में डालकर फैला लेंवे। प्रति किलो बीज के लिए ROOT- RISE 5 ग्राम की मात्रा में लेकर उसमें इतना पानी मिलावे की पेस्ट बना जाए पेस्ट को बीजो पर छिड़ककर पेस्ट के साथ बीजो को रगड़ने से काले रंग की परत बीजो पर चढ़ जाएगी अगर बीजो पैर ROOT-RISE पाउडर स्वरूप में दिख रहा हो तो उसमें थोड़ा और पानी मिलाकर रगड़ने की आवश्यकता है। कब बीजो को छायादार जगह पर सूखा लेंवे। और अब बुवाई के लिए प्रयोग करे।


खाद में मिलाकर भी प्रयोग कर सकते है।

पहली बार खाद डालते समय खाद में 500 ग्राम ROOT- RISE प्रति एकड़ के हिसाब से डालने पर 8 से 10 दिन में स्प्ष्ट रूप से प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाई देने लगता है।

ये काम करता है” “ROOT RISE”

👉1.मिटटी को उपजाऊ बना देता है, मिटटी में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ा देता है।

👉2. मिटटी में केंचुए काम करना सुरु कर देते है।

👉3.फसल को मिटटी से होनेवाले सभी रोगों से मुक्ति दिलाता है।

👉4. “ROOT RISE” का उपयोग फसल की प्रारंभिक अवस्था अथवा आधार खाद के साथ मिलाकर उपयोग करने से खाद की उपयोगिता को बढाता है। इसके क्षरण को रोककर पौधों के लिए भरपूर भोजन उपलब्ध करता है |


👉5. यह सम्पूर्ण जाइम का कार्य करता है | इसके उपयोग के पश्चात् अलग के किसी प्रकार के जाइम की आवश्यकता नहीं है |

“ROOT RISE” उपयोग से लाभ :-
👉1. पोधे के भोजन ग्रहण करने वाली जड़ो का विकास करता है तथा पौधे की बढवार में सहायक।
👉2. पौधे में संतुलित नाइट्रोजन ग्रहण तथा भूमि में उपस्थित नाइट्रोजन की उपयोगिता को बढाता है ।
👉3. भूमि में उपस्थित पोटाश, कैल्शियम तथा फास्फोरस को पौधे के लिए उपलब्ध कराता है ताकि पौधे, जड़ो के माध्यमसे आसानी से ग्रहण कर सके ।
👉4. पौधे में संतुलित पोषक तत्वों को भोजन के रूप में उपलब्ध कराता है तथा विपरीत परिस्थिति अथवा ओवर दोस होने पर इसके विपरीत प्रभाव को कम करता है ।
👉5. पौधे में प्राकृतिक रूप से रोग तथा कीट प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है।
👉6. भूमि की उर्वरा शक्ति को बढाता है तथा खाद एवं अन्य क्षरण को कम करता है और जल धारण क्षमता को बढाता है ।
👉7. अंकुरण क्षमता को बढाता है तथा भूमि के पी.एच. को न्यूट्रल करता है।

“ROOT RISE” के उपयोग की विधि :-
👉1. लगभग सभी प्रकार के जैविक एवं रासायनिक खाद के साथ मिलाकर उपयोग किया जा सकता है |
👉2. सिस्टमिक कीटनाशक एवं कैल्शियम नाइट्रेट के साथ न मिलाये |
👉3. सभी घुलनशील खाद के साथ मिलाकर भी उपयोगकिया जा सकता है |


“ROOT RISE” की मात्रा :-
👉1. आधार खाद के साथ मिलाकर डालने के लिए 500 ग्राम प्रति एकड़ |
👉2. स्प्रे के व्दारा : 250 ग्राम प्रति एकड़ 200 लीटर पानी के साथ मिलाकर
👉3. ड्रीप के व्दारा : 250 ग्राम प्रत्येक बार घुलनशील खाद के साथ मिलाकर देना उचित है |

”ROOT RICE ” के प्रयोग के बाद उत्पादित जैविक भिंडी
”ROOT RICE ” के प्रयोग के बाद उत्पादित जैविक फूल गोभी

उपलब्धता
अधिक जानकारी हेतु इस नम्बर में संपर्क करें….
8982831488
7987698708

जानिए मखाना की खेती कैसे देगी लाखों की पैदावार

मखाना की खेती मुख्य रूप से पानी की घास के रूप में होती है. इसको कुरूपा अखरोट भी कहा जाता है. मखाना की लगभग 88 प्रतिशत खेती अकेले बिहार में की जाती है. मखाना पोषक तत्वों से भरपूर एक जलीय उत्पाद है. जिसके अंदर प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट काफी मात्रा में मिलते हैं. जो मनुष्य के लिए लाभदायक होते हैं. इसका इस्तेमाल खाने में लोग मिठाई, नमकीन और खीर बनाने में लेते हैं. इसके अलावा दूध में भिगोकर इसे छोटे बच्चों को खिलाया जाता है. इसकी खेती के लिए जल भराव वाली भूमि की जरूरत होती है. भारत में इसकी खेती गर्म और शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में की जा सकती है. इसके पौधे पर कांटेदार पत्ते आते हैं. और इन्ही कांटेदार पत्तों पर बीज बनते है. इसके पत्तों से बीज निकलने के बाद वो तालाब की सतह में चले जाते हैं. जिन्हें पानी से निकालकर एकत्रित किया जाता है. वर्तमान में इसकी खेती छत्तीसगढ़ में भी की जा रही है. लेकिन इसकी खेती करने वाले किसान भाइयों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. इसके फल समय पर प्राप्त नही होने और सतह में चले जाने से लगभग 25 प्रतिशत फल खराब हो जाता है.


संभावनाएं

■छत्तीसगढ़ में धान की खेती करने वाले किसानों के लिए आय में दुगुनी वृद्धि हेतु मखाना एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

■औशधि गुणों से भरपूर आंगन बाड़ी के माध्यम से महिलाओं एवं बच्चो के कुपोषण दूर करने में एक बेहतर विकल्प हो सकता है।

■कोरोना काल मे super food मखाना की विश्व स्तर में मांग बढ़ी है।

छत्तीसगढ़ में हो रही है मखाना की खेती


ग्राम लिंगाडीह ब्लॉक आरंग जिला रायपुर में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर मखाना की खेती 30 एकड़ में कर रहे है। डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर छत्तीसगढ़ में इतने बड़े स्तर पर मखाना की खेती करने वाले पहले कृषक है।

डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर बताते है कि वे मखाना का प्रसंस्करण कर छत्तीसगढ़ की जनता को मखाना उपलब्ध कराना चाहते है जिसकी तैयारी भी लगभग पूर्ण हो चुकी है। उन्होंने इसकी पैकेजिंग कराकर अपने पिताजी स्वर्गीय श्री कृष्ण कुमार चन्द्राकर “दाऊ जी” के नाम पर ही मखाना का ब्रांड नेम दिया है जो कि काफी आकर्षक है।

उपयुक्त वातावरण


मखाने की खेती के लिए जल भराव वाली काली चिकनी भूमि उपयुक्त होती है. क्योंकि इसके पौधे पानी के अंदर ही उगते हैं. इसके लिए जलभराव वाली जमीनों में मिट्टी खोदकर तालाब बनाये जाते हैं. जिनमें पानी अधिक समय तक स्थिर बना रहता है. इसकी खेती उष्णकटिबंधीय भागों में की जाती है. इसके पौधे को विकास करने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है.


तालाब तैयार करना


मखाना की खेती पूरी तरह से ऑर्गेनिक तरीके से की जाती है. इसके लिए मिट्टी को खोदकर उसमें पानी भर दिया जाता है. उसके बाद मिट्टी और पानी को मिलकर कीचड़ तैयार किया जाता है. इस कीचड़ वाले भाग में इसके बीजों को लगाया जाता है. कीचड़ तैयार करने के बाद तालाब में फिर से पानी भर दिया जाता है. तालाब में पानी की भराई कम से कम 6 से 9 इंच तक की जानी चाहिए. इसके अलावा अधिकतम 4 फिट पानी काफी होता है. इन तालाबों को बीज लगाने के लगभग दो महीने पहले तैयार किया जाता है।


तालाब विधि


यह मखाना की खेती करने की परम्परागत विधि है। इस विधि में बीज को बोने की आवश्यकता नहीं होती हैं क्योंकि पूर्व वर्ष के तालाब में बचे बीज आगामी वर्ष के लिए बीज का काम करते हैं। जबकि खेती विधि में मखाना के बीज को सीधे खेतों में बोया जाता है या पिफर धन की पफसल की भाँति तैयार पौध् की रोपनी नये तालाब में की जाती है। परम्परागत विधि में मखाना के खेतों में माँगुर, सींघी, केवई, गरई, ट्रैश आदि जंगली मछलियाँ बाढ़ के पानी के साथ तालाब में प्रवेश कर जाती हैं जिसे किसान अतिरिक्त पफसल के रूप में प्राप्त करते हैं।


बीज रोपण का तरीका और टाइम


मखाना के बीजों को तालाब की निचली सतह में लगाते हैं. लेकिन बीजों को तालाब में लगाने से पहले पानी में उत्पन्न हुई सभी तरह की खरपतवार को नष्ट कर तालाबों की सफाई कर देनी चाहिए. जिससे पौधे की पैदावार या पौधे पर किसी तरह का कोई रोग या खरपतवार का असर देखने को ना मिले. खरपतवार नष्ट करने के बाद इसके बीजों को तालाब की निचली सतह में 3 से 4 सेंटीमीटर नीचे मिट्टी में लगाते हैं. एक हेक्टेयर में बनाए गए तालाब में लगभग 80 किलो बीज लगाया जाता हैं।
इसके बीजों को सीधा तालाब में उगा सकते हैं. लेकिन कुछ किसान भाई इसके बीजों की पौधा तैयार कर खेतों में लगाते हैं. इसके बीजों से नवम्बर या दिसम्बर माह में ही पौध तैयार कर ली जाती है. उसके बाद इन्हें तालाब में लगाया जाता है. इसके पौधों को तालाब में लगाने का सबसे उपयुक्त टाइम जनवरी और फरवरी का महीना होता है. इस विधि में 30 से 90 किलोग्राम स्वस्थ मखाना बीज को तालाब में दिसम्बर के महीने में हाथों से छिंटते हैं। बीज को लगाने के; दिसम्बर से जनवरी 35 से 40 दिन बाद पानी के अंदर बीज का उगना शुरू हो जाता है तथा फरवरी के अंत या मार्च के शुरू में मखाना के पौधे जल की ऊपरी सतह पर निकल आते है। इस अवस्था में पौधे से पौधे एवं पंक्ति से पंक्ति के बीच की दूरी 1 मीटर X 1 मीटर बनाये रखने के लिए अतिरिक्त पौधें को निकाल दिया जाता है।


रोपाई विधि
स्वस्थ एवं नवजात पौधे की रोपाई मार्च से अप्रैल के महीने में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे की दूरी 1.20 मी. – 1.25 मी. पर की जाती है। रोपाई के लगभग दो महीने के बाद चमकीले बैंगनी रंग का एकल फूल जहाँ-तहाँ से निकलना शुरू हो जाता है। फूल निकलने के 35 से 40 दिनों बाद फल पूरी तरह से विकसित एवं परिपक्व हो जाते हैं। फल एवं मखाना के सभी भाग कँटीले प्रकृति के होते है। मखाना के फल पूरी तरह से पिरपक्व हो जाने के पश्चात गुद्देार फल फटना शुरू हो जाते हैं। मखाना के फल पूरी तहर से परिपक्व हो जाने के पश्चात् गुद्देदार पफल पफटना शुरु हो जाते हैं।
फल फटने के बाद पानी की ऊपरी सतह पर तैरते है तथा 2 से 3 दिन तालाब की निचली सतह पर बैठना शुरू हो जाते हैं। फूलों के विकसित होने एवं फल के फटने की प्रक्रिया सितम्बर के महीने तक चलती रहती है। सितम्बर के महीने के अंत या अक्टूबर महीने में स्थानीय औजार, जिसे गंजा कहते है, की सहायता से जलाश्य की सतह में 5 से 30 सेमी. की गहराई में बैठे बीजों को कुशल श्रमिकों की सहायता से जमा किया जाता है। फसल कटाई के 2 से 3 महीने बाद जलाश्य में शेष बचे लगभग एक तिहाई बीज जो इकठ्ठा करते समय छूट जाते है दूसरी फसल के लिए अंकुरित होना शुरू कर देते हैं।


खेत प्रणाली
यह मखाना की खेती करने की नई विधिहै जिसे मखाना अनुसंधन केन्द्र द्वारा विकसित किया गया है। इस विधिद्वारा मखाना की खेती 1 फीट तक पानी से भरे कृषि भूमि में की जाती है। यह मखाना की खेती की बहुत ही सरल विधिहै जिसमें एक ही खेत में मखाना के साथ-साथधन एवं अन्य फसलों को उपजाने का अवसर मिलता है। मखाना के पौधें को सर्वप्रथम नर्सरी में तैयार किया जाता है। रोपाई प्रायः पफरवरी के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के तीसरे सप्ताह तक की जा सकती है जो मुख्यतः खेत की उपलब्ध्ता एवं बिचड़े की स्थिति पर निर्भर करती है। इस विधि के द्वारा मखाना की खेती का समय घटकर मात्रा चार महीने रह जाता है। मखाना की खेती का विस्तृत वर्णन निम्न है।


नर्सरी
मखाना एक जलीय पौध है इस कारण पानी को संग्रहित करने वाली कार्बनिक पदार्थ से युक्त क्ले मिट्टी में मखाना का पौध सही रूप से विकास करता है। यही वजह है चिकनी एवं चिकनी-दोमट मिट्ट्टी इसके लिएबहुत उपयुक्त मानी जाती है। खेत को मखाने के लिए तैयार करने हेतु दो से तीन गहरी जुताई की आवश्यकता होती है तथा बिचड़े के सही विकास हेतु रासायनिक खाद नाइट्रोजन, पफास्पफोरस एवं पोटाश क्रमशः 100ः60ः40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के अनुपात में डालना चाहिए। इसके बाद खेत जिसमें मखाना के बिचड़े को तैयार करना है, का समतलीकरण कर दो पफीट ऊँचा बाँध् खेत के चारों तरपफ बनाना चाहिए। खेत तैयार होने के बाद उसमें लगभग 1.5 पफीट पानी डाल कर मखाना के बीज की दिसम्बर महीने में बोआई कर देनी चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्रा में मखाने की बुआई के लिए लगभग 500 मी क्षेत्रा में नर्सरी तैयार करना चाहिए। इसके लिए लगभग 20 किलो मखाना के स्वस्थ बीज को पानी से भरे तैयार खेत में एक समान छींट देना चाहिए। बिचड़ा तैयार होने तक लगभग एक फीट पानी का स्तर बनाये रखना चाहिए दिसम्बर से अप्रैल तक। प्रायः यह देखा गया है कि प्रारंभिक अवस्था में बिचड़ा में एपिफड का प्रकोप बना रहता है। लेकिन कीटनाशक का छिड़काव कर बिचड़ा को एफिड से बचाया जा सकता है। मार्च महीने के अंत तक बिचड़ा रोपाई के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।


खेत की तैयारी
खेत की 2 से 3 गहरी जुताई के बाद ट्रैक्टर या देशी हल की सहायता से पाटा देकर खेत को मखाना की खेती के लिए तैयार करते है। मखाना की खेती के लिए खेत उपलब्ध् होने पर मखाना के लिए खेत की तैयारी पफरवरी के प्रथम सप्ताह से अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक हर हाल में पूरी कर लेनी चाहिए। बिचड़ा के रोपाई से पूर्व खेत के चारों तरपफ 2 पफीट ऊँचा बाँध् बनाकर लगभग 1 पफीट पानी भर देना चाहिए। उसके बाद ट्रैक्टर आधरित गीली जुताई करने के उपकरण से 2 से 3 बार खेतों में कदवा करना चाहिए। खेतों में कदवा करना मखाना की खेती के लिए परम आवश्यक है क्योंकि यह नीचे की ओर होने वाले पानी के रिसाव को रोकता है।


खाद एवं उर्वरक
परम्परागत तरीके से तालाबों में मखाने की खेती में किसान खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग नहीं करते थे। लेकिन इसके विपरीत खेतों में मखाना की पैदावार लेने के लिए खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग अति आवश्यक है। मखाना को बड़े एवं भारी पत्तों वाला जलीय पौध होने की वजह से ज्यादा पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं। मखाना की फसल में औसतन नेत्राजन, स्पफूर एवं पोटाश क्रमशः 100ः60ः40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। पोषक तत्वों की उपर्युक्त मात्रा को पूरा करने के लिए कार्बनिक (15 टन/हे.) एवं अकार्बनिक दोनों तरह के उर्वरकों की आवश्यकता पड़ती है।


खेतों में रोपाई
नर्सरी में पौध तैयार होने पर स्वस्थ पौधें को उखाड़ कर उन्हें अच्छी तरह से कदवा किये गये खेत में पंक्तियों में ही लगाना चाहिए। अनुसंधन से यह पाया गया कि पौधें से पौधें एवं पंक्ति मखाना की रोपाई के लिए मुख्य खेत की तैयारी 9 से पंक्ति के बीच की दूरी 1.20 मी. X 1.25 मी. रखनी चाहिए ताकि मखाने के पौधें की सही बृद्धि एवं विकास हो सके। पौधें की रोपाई का कार्य फरवरी के प्रथम सप्ताह से लेकर अप्रैल के द्वितीय सप्ताह तक अवश्य कर लेना चाहिए ताकि पफसल से अध्कि से अध्कि उत्पादन लिया जा सके।
जल प्रबंधन
परम्परागत तरीके से मखाना की खेती करने पर सामान्यतः किसानों को तालाबों में ज्यादा जल भराव करना होता था, वैसे भी जलीय पौध होने की वजह से मखाना की खेती के लिए निरंतर जल की व्यवस्था अति आवश्यक है। नर्सरी में मखाना के पौधें को तैयार होने में लगभग चार महीने लगते है। चूँकि इसकी रोपाई मार्च के अंत एवं अप्रैल महीने में होती है तथा रोपाई के बाद इसकी बृद्धि एवं विकास अप्रैल से अगस्त महीने में होती है जब पफसल को सामान्यतः पानी मानसून में होने वाली वर्षा से प्राप्त होता है। असामान्य वर्षा के समय किसानों को 4 से 5 बार या इससे ज्यादा भी सिंचाई की आवश्यकता होती है।


खरपतवार नियंत्रण
मखाने के विकास की प्रारंभिक अवस्था में अवांछनीय पौधें का प्रकोप बढ़ जाता है। अतःशुरूआत में मखाना के खेत से कुछ अंतराल पर खरपतवार को निकालते रहना चाहिए। पौधें की रोपाई के 30 से 40 दिन बाद मखाना के पत्ते का वानस्पतिक विकास कापफी तेजी से होता है। खरपतवार की बृद्धि कम हो जाती है। समेकित कृषि प्रबंध्न में मखाना के साथ मछली एवं सिंघाड़ा लेने से दिसम्बर से जनवरी महीने में मछली के निकासी के वक्त जाल डालने से खरपतवार काफी हद तक कम हो जाते है।पुष्प एवं फल का लगना
मखाना के पौधें में पुष्प एवं पफल का बनना मई के महीने में शुरू होता है जो अक्टूबर एवं नवम्बर तक चलता रहता है। मखाना के पौधें की यह खासियत है कि इसके सभी पौधंे में फूल एवं फल एक साथ नहीं लगते। फल परिपक्व होने के खेत प्रणाली में मखाना की रोपाई पुष्पावस्था में मखाना की फसल 10बाद पफटना शुरू हो जाता है। परिणाम स्वरूप मखाना के बीज पानी की ऊपरी सतह पर तैरने लगते है। पिफर 2 से 3 दिनों बाद तालाब/खेत की निचली सतह पर बीज बैठ जाता है। फल के पफटने एवं बीज के पानी की सतह के नीचे बैठने की क्रिया पफसल अवध् ितक चलती रहती है।
फसल की कटाई
मखाना के संदर्भ में पफसल कटाई का मतलब तालाब/खेत की सतह पर एकत्रा बीजों का एकत्राीकरण होता है। मखाना की पारम्परिक खेती में बीजों के जमा करने का सिलसिला अगस्त से अक्टूबर महीने तक चलता है। जबकि खेतों में यह प्रक्रिया अगस्त महीने तक चलती है। इसका मुख्य कारण खेतों की कम गहराई (1 से 2 फीट) का होना है। प्रायः बीजों का एकत्राीकरण सुबह 6 से 11 बजे तक में पारम्परिक तरीके से की जाने वाली खेती में किया जाता था। करीब 4 से 5 लोगों का समूह बीज को तालाब की सतह से एकत्रा करते थे। बीज को एकत्रा करने में लगने वाला समय उसकी तालाब/खेतों में उपलब्ध् मात्रा पर निर्भर करता है। खेतों में की जाने वाली मखाने की खेती में पानी की गहराई कम होने की वजह से बीजों को एकत्रित करना कापफी सरल है तथा कम अवध् िमें हो जाता है।
पौधों का विकास
बीज रोपाई के लगभग एक से डेढ़ महीने बाद इसके पौधे सतह पर कांटेदार पत्तों के रूप में फैलने लगते हैं. जिनसे पूरा तालाब ढक जाता है. इन पत्तियों पर ही इसके फूल खिलते हैं. इसके फूलों के खिलने के लगभग तीन से चार दिन बाद इनमें बीज बनने लगते हैं. पत्तियों पर बीज लगने के लगभग दो महीने बाद ये पककर तैयार हो जाते हैं. पत्तियों पर पककर तैयार हुए बीज पौधे से अलग होकर पानी सतह पे तैरने लगते है. इसके बीज पानी की सतह पर एक से दो दिन तक तैरते रहते हैं. उसके बाद बीज पानी की सतह में चले जाते है. जिन्हें किसान भाई पौधों को हटाने के बाद सतह से निकालते हैं.
बीज उत्पादन
तालाब विधि से मखाना की खेती करने पर औसतन 1.4 से 2.2 टन/हे. बीज का उत्पादन होता है जो बुआई के लिए प्रयुक्त बीज की आनुवांशिक क्षमता पर निर्भर करता है। जबकि खेती विधि से मखाना की खेती करने पर उसी बीज को इस्तेमाल करने पर उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है जो 2.6 से 3.0 टन/हे. दर्ज की गई हैं। अब तक मखाना की कोई उन्नत किस्म उपलब्ध् नहीं है। परन्तु उन्नत किस्म को विकसित करने के क्षेत्रा में अनुसंधन जारी है और कुछ विशु( वंशक्रम का विकास किया जा चुका है जिसकी उत्पादन क्षमता 2.8 से 3.0 टन/हे. है।
मखाना के पौधे में लगने वाले कीट एवं व्याधि
अन्य फसलों की भाँति मखाना की पफसल में भी कीड़े एवं रोगों का प्रकोप बना रहता है। इस पफसल में मुख्यतः एपिफड, केसवर्म, जड़ भेदक के प्रकोप का खतरा बना रहता है। नर्सरी में मखाना का बिचड़ा तैयार करते समय एपिफड के प्रकोप का ज्यादा खतरा रहता है। परन्तु केसवर्म एवं जड़ भेदक का प्रकोप पूर्ण रूप से विकसित मखाना के पौधें में दिखाई पड़ता है।
एफिड
एपिफड सामान्यतः मखाना के नवजात पौधें की पत्तियों को नुकसान पहुँचाते हैं। जबकि केसवर्म एवं जड़ भेदक क्रमशः फूल एवं जड़ को नुकसान पहुँचाते हैं।
नियंत्राणः एपिफड एवं केसवर्म के प्रकोप से पौधें को सुरक्षित रखने के लिए 0.3 प्रतिशत नीम तेल के घोल का छिड़काव करना चाहिए। जड़ भेदक से बचाव के लिए 25 किलोग्राम नीम की खल्ली को प्रारम्भ में खेत की तैयारी करते वक्त डालना चाहिए।
झुलसा रोग
मखाना में होने वाला झुलसा रोग एक बहुत ही नुकसानदायक फफूँदीजनक रोग है। इसे उत्पन्न करने वाला ऑर्गनिज़म को अल्टरनेरिया टिनुईस कहते हैं। यह प्रायः पूर्ण रूप से विकसित मखाना के पौधें में होता है। इस रोग से प्रभावित पत्तियों के ऊपरी सतह पर गहरे भूरे या काले रंग का लगभग गोलाकार मृत क्षेत्रा जहाँ-तहाँ बन जाता है। इसमें प्रायः समक्रेंद्री बहुत सारे छल्ले एवं पटरी रूपी विकृति हो जाती जो टारगेट बोर्ड को इपफेक्ट देती है। बहुत सारे ध्ब्बे मिलकर बाद में बड़े एक पौधें द्वारा उत्पादित बीज 13 ध्ब्बे बनाते हैं। जब यह बीमारी अन्तिम अवस्था में होती है तो पत्ते पूरी तरह से जले या झुलसे हुये प्रतीत होते हैं।
नियंत्रणः मखाना में लगने वाले झुलसा रोग को नियंत्रित करने के लिए काॅपर ऑक्सीक्लोराइड, डाइथेर्न Z-78 या डाइथेन M-45 का 0.3 प्रतिशत घोल का पन्द्रह दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव करना चाहिए।
फल सड़न
हाल में मखाना में पफल सड़न रोग देखा गया है पर अभी तक इसे उत्पन्न करने वाले कीटाणु का पता नहीं चल पाया है। पिफर भी इसे कवक जनित रोग की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि इस रोग में कार्बेन्डाजिम एवं डाइथेन M-45 के 0.3 प्रतिशत घोल से पत्तियों पर छिड़काव करने पर यह बीमारी कापफी हद तक नियंत्रित हो जाती है। इस रोग से ग्रसित पौध पूर्ण रूप से स्वस्थ नजर आता है परन्तु इसके अविकसित पफल सड़ना शुरू हो जाते हैं जिससे आर्थिक उत्पाद कापफी प्रभावित होता है।

अति अंगवृद्धि (हाइपरट्राॅफी)
कुछ पौधें में अति अंगबृद्धि (हाइपरट्राॅपफी) रूपी बीमारी को देखा गया है हालांकि यहमखाना के पौधे के लिए गंभीर बीमारी नहीं हैं। लेकिन हाइपरट्राॅपफी से ग्रसित  पौधें के पूल एवं पत्ते असामान्य बृद्धि से प्रभावित उत्तकों की वजह से बुरी तरह से खराब हो जाते हैं। यह बीमारी डोसानसियोपसिस यूरेलि नामक फफूद से भी होता है। पत्तियों एवं फूलों में होने वाली असामान्य बृद्धि की वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इस बीमारी के लक्षण किसी खास जगह पर नहीं होते लेकिन साधरणतः यह पत्रा फलक से डंठल एवं पुष्पासन की तरफ फैलता है इस कारण फूल के निचले हिस्से को कापफी क्षति होती है। परिणामस्वरूप फूल में बीज भी नहीं बन पाते। अभी तक इस बीमारी की रोक थाम के लिए कोई भी शोध् रिपोर्ट नहीं है। अतः जल्द से जल्द इस बीमारी की रोकथाम के लिए गहन अध्ययन एवं शोध् किये जाने की आवश्यकता है।


बीजों की पैदावार
इसके पौधे कांटेदार होते हैं जो पूरे तालाब की ढके हुए होते हैं. इस कारण जब इसके बीज पौधे से अलग होते हैं तो उन्हें किसान भाई एकत्रित नही कर पाते. जिसके कारण बीज सतह में चले जाते हैं. उसके बाद जब पौधों पर सभी बीज पककर गिर जाते हैं तब पौधे को हटाकर सतह से इसके बीजों को एकत्रित कर लिया जाता है. इस दौरान इसके बीजों को निकालने में एक से दो महीने का टाइम लग जाता है. जिससे बीजों में काफी ज्यादा नुकसान हो जाता है. इसके बीजों को पानी से निकालकर उनके छिलके को हटाकर साफ़ किया जाता है. उसके बाद उन्हें लकड़ी की हथोड़ी से पीटकर उनसे लावा निकाल लिया जाता है. तीन किलो कच्चे बीजों से एक किलो मावा प्राप्त होता है. जिससे मखाना तैयार किया जाता है. एक क्विंटल मखाना गुडी से लगभग 40 किलो मावा निकलता है. जिससे किसान भाइयों की अच्छी कमाई हो जाती है.

छत्तीसगढ़ में अब तक 1210.1 मि.मी. औसत वर्षा दर्ज

रायपुर, 30 सितम्बर 2020


प्रदेश के राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा बनाए गए राज्य स्तरीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष में संकलित जानकारी के अनुसार प्रदेश में एक जून से अब तक कुल 1210.1 मि.मी. औसत वर्षा दर्ज की जा चुकी है। प्रदेश में सर्वाधिक बीजापुर जिले में 2273.7 मि.मी. और सबसे कम सरगुजा में 821.6 मि.मी. औसत वर्षा अब तक रिकार्ड की गई है।
राज्य स्तरीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष से मिली जानकारी के अनुसार एक जून से अब तक

■सूरजपुर में 1306.7 मि.मी.

■बलरामपुर में 1074.9 मि.मी.

■जशपुर में 1292.3 मि.मी.,

■ कोरिया में 1042.9 मि.मी.

रायपुर में 1042.1 मि.मी.

■ बलौदाबाजार में 1063.5 मि.मी.

■ गरियाबंद में 1191.2 मि.मी.,

महासमुन्द में 1260.4 मि.मी.

■ धमतरी में 1116.2 मि.मी.

बिलासपुर में 1238.7 मि.मी

मुंगेली में 904.9 मि.मी.

■रायगढ़ में 1207.2 मि.मी.

■ जांजगीर-चांपा में 1315.7 मि.मी.

■ कोरबा में 1330.7 मि.मी.

गौरेला-पेन्ड्रा-मरवाही में 1051.3 मि.मी.

■ दुर्ग में 1004.2 मि.मी.

■ कबीरधाम में 953.4 मि.मी.,

राजनांदगांव में 923 मि.मी.,

■ बालोद में 1021.2 मि.मी.,

■ बेमेतरा में 1077.1 मि.मी.

■बस्तर में 1379.5 मि.मी.,

कोण्डागांव में 1489 मि.मी.,

कांकेर में 1026.1 मि.मी.,

नारायणपुर में 1405.1 मि.मी.,

दंतेवाड़ा में 1560.1 मि.मी.

■ सुकमा में 1508.8 मि मी औसत दर्ज की गई है।

किसान अपने खेतों की मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की जांच खुद कर सकेंगे।

कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित मिट्टी परीक्षण किट को मिला भारत सरकार का पेटेंट

किसान अपने खेतों की मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की जांच खुद कर सकेंगे

रायपुर, 30 सितम्बर 2020। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. एस.के. पाटील के नेतृत्व में मृदा वैज्ञानिकों के एक दल ने खेतों की मिट्टी की जांच के लिए कम लागत वाला चलित मिट्टी परीक्षण किट विकसित किया है जिसकी सहायता से किसान अपने खेतों की मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की जांच स्वयं कर सकेंगे। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित इस चलित मृदा परीक्षण किट की तकनीक को भारत शासन द्वारा पेटेन्ट प्रमाण पत्र प्रदान किया गया है। यह इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय और छत्तीसगढ़ राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। खेतों तक ले जाने में सुविधाजनक और उपयोग में आसान इस किट की मदद से किसान अपने खेतों की मिट्टी में उपलब्ध नत्रजन, स्फुर और पोटाश जैसे पौधों के लिए आवश्यक प्राथमिक पोषक तत्वों के साथ ही आॅर्गेनिक कार्बन तथा मिट्टी की अम्लीयता अथवा क्षारीयता की जांच कर कृषि एवं बागवानी फसलों के लिए आवश्यक खाद एवं उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण कर सकंेगे। कृषि विश्वविद्यालय द्वारा इस किट का व्यवसायिक उत्पादन जल्द शुरू किया जाएगा।
कुलपति डाॅ. एस.के. पाटील, जो स्वयं एक मृदा वैज्ञानिक हैं, के नेतृत्व में मृदा वैज्ञानिकों के जिस दल ने इस चलित मिट्टी परीक्षण किट की तकनीक विकसित की है उनमें डाॅ. एल.के. श्रीवास्तव, डाॅ. वी.एन. मिश्रा एवं डाॅ. आर.ओ. दास शामिल हैं। लगभग ढ़ाई किलो वजन के इस मिट्टी परीक्षण किट के साथ दी गई निर्देश पुस्तिका एवं सी.डी. की सहायता से किसान स्वयं अपनी खेतों की मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की जांच कर सकते हैं। इस परीक्षण किट में विभिन्न सांद्रता के रासायनिक द्रव, अम्ल, रासायनिक पावडर, फिल्टर पेपर, प्लास्टिक स्टैंड, टेस्ट ट्यूब, फनल, डिस्टिल्ड वाटर, कलर चार्ट आदि दिये गये हैं। मिट्टी के नमूनों में अलग-अलग प्रकार के रसायनों का उपयोग कर विकसित होने वाले रंगों के गहराई के आधार पर मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों की मात्रा का पता लगाया जा सकता है। मिट्टी परीक्षण परिणाम तथा उर्वरक अनुशंसाओं के आधार पर प्रमुख फसलों के लिए उर्वरकों की आवश्यक मात्रा की गणना करने का तरीका भी पुस्तिका में दिया गया है। मिट्टी की जांच के आधार पर किसान विभिन्न फसलों के लिए आवश्यक यूरिया, सुपर फास्फेट, पोटाश तथा चूने की आवश्यक मात्रा का निर्धारण कर सकेंगे।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार द्वारा देश भर के किसानों को उनकी खेतों की मिट्टी के परीक्षण के उपरांत स्वाइल हेल्थ कार्ड दिया जा रहा है। स्वाइल हेल्थ कार्ड में किसे खेत में किस पोषक तत्व की कमी है इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाता है। छत्तीसगढ़ के सभी जिला मुख्यालयों में मिट्टी परीक्षण केन्द्रों की स्थापना की गई है जहां से परिणाम प्राप्त होने में चार से पांच दिन लग जाते हैं और आने-जाने में अलग से व्यय होता है। पोर्टेबल मिट्टी परीक्षण किट से अब किसानों की मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाओं पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी। इससे भविष्य में कृषि के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आएंगे।

साभार

(संजय नैयर)
सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी

रामा क्रॉप साइंस का है ये वादा कम खर्च उपज ज्यादा “MULTIPLAYER”

प्रायः किसान भाई अपनी फसल को स्वस्थ रखने के लिए कई प्रकार के रसायनिक दवाओं का उपयोग करते है जो कि पर्यावरण संतुलन को तो बिगाड़ता ही है साथ ही साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी काफी घातक है। रासानिक दवाओं के उपयोग से जहां हम अपनी जमीन को बंजर बना रहे है वही जाने अनजाने में हम कई घातक बीमारियों को भी आमंत्रित कर रहे है आज के समय मे यह बेहद आवश्यक हो गया है कि रसायनिक दवाओं का विकल्प तलाशा जाए

आज की कड़ी में हम एक ऐसे उत्पाद के बारे में बताएंगे जो कि एक जैविक उत्पाद है

श्री आनन्द ताम्रकार RAMA CROP SCIENCE PVT. LTD.बताएंगे की किसान भाइयों के कितना उपयोगी है ये उत्पाद “MULTIPLAYER”

आखिर है क्या “MULTIPLAYER”

मल्टी प्लेयर ह्यूमिक, फलविक, सिलिका एवं आर्गेनिक पोटाश अम्ल का सम्मिलित रूप हैं। इन अम्लों के जैविक क्रियाओं मैं अहम भूमिका हैं।
इसका उपयोग करने से मृदा मिट्टी के प्राकृतिक गुणों को बनाये रखने में सहायक हैं, पौधे वृध्दि कारक एवं मिट्टी सुधारक हैं।

क्या काम करता है “MULTIPLAYER”

फसल में भोजन ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाता हैं।

जड़ो के विकास एवं पौधे की बढ़वार के लिए बहुत ही उपयोगी हैं।

भूमि में नाइट्रोजन क्षरण को कम करने में सहायक हैं।

चिलेशन की वजह से ज़मीन में उपलब्ध पोषक तत्वों को जड़ों तक पहुँचाता हैं

भूमि में स्थिर फॉस्फोरस को भोजन के रूप में उपलब्ध कराता हैं।

फसलों में कीट एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता हैं।

फल, सब्जी एवं फसल के दोनों की गुणवत्ता को बढ़ाता हैं।

सिलिकॉन पौधे में सूखा सहन करने की क्षमता को बढ़ाता हैं, बाली एवं दानों को मजबूत बनाता हैं।

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अधिक जानकारी के लिए या अपने शहर व गांव में फ्रेंचाइजी लेना चाहते है तो Whats App से संपर्क करें – 9826652223 एवं 9893898303

किसान भाइयों की सुविधा के लिए यह उत्पाद AMAZON में भी उपलब्ध है। किसान भाई नीचे फ़ोटो पर क्लिक कर ऑर्डर कर सकते है।

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रोग प्रबंधन:-फसलों में लगने वाले ब्लाइट व ब्लास्ट की कारगर दवा “ALL IN ONE “

RAMA CROP SCIENCE PVT. LTD.

प्रायः किसान भाई अपनी फसल को बीमारियों से बचाने के लिए कई प्रकार के रसायनिक दवाओं का उपयोग करते है जो कि पर्यावरण संतुलन को तो बिगाड़ता ही है साथ ही साथ मानव स्वास्थ्य के लिए भी काफी घातक है। रासानिक दवाओं के उपयोग से जहां हम अपनी जमीन को बंजर बना रहे है वही जाने अनजाने में हम कई घातक बीमारियों को भी आमंत्रित कर रहे है आज के समय मे यह बेहद आवश्यक हो गया है कि रसायनिक दवाओं का विकल्प तलाशा जाए।

आज की कड़ी में हम एक ऐसे उत्पाद के बारे में बताएंगे जो कि एक जैविक उत्पाद है।

श्री आनन्द ताम्रकार RAMA CROP SCIENCE PVT. LTD.बताते है कि “ALL IN ONE” फसल में लगने वाले ब्लाइट व ब्लास्ट रोगों के लिए कारगर है।

फसल को इन बिमारियों से बचायेगा “ALL IN ONE”

ब्लाइट, ब्लास्ट जैसे रोग जो कि धान, गन्ना, सोयाबीन, कपास मटर, भिन्डी, बैगन, कदुवर्गीय फसल आदि मे लगता है।

उसके रोकथाम के लिए लाभकारी है।

छिड़काव करें (प्रति एकड़)

स्प्रे के लिए – 2 ग्राम ALL IN ONE प्रति लीटर पानी के साथ स्प्रे करें या 3०० ग्राम ALL IN ONE को 150 लीटर पानी में मिलकर

बीजोपचार के लिए –

2 ग्राम “ALL IN ONE” को प्रति किलोग्राम
बीज के साथ मिलाकर बीजोपचार करे (प्रति एकड़)

साभार
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RAMA CROP SCIENCE PVT. LTD.
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अधिक जानकारी के लिए या अपने शहर व गांव में फ्रेंचाइजी लेना चाहते है तो Whats App से संपर्क करें 9826652223 एवं 9893898303

कृषि महाविद्यालयों में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश प्रक्रिया जारी, कक्षा बारहवीं के प्राप्तांकों के आधार पर मिलेगा दाखिला


इच्छुक विद्यार्थी 10 सितंबर तक कर सकते हैं आॅनलाइन आवेदन

रायपुर, 28 अगस्त 2020। कोविड-19 संक्रमणकाल के दौरान इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित शासकी एवं निजी कृषि/उद्यानिकी महाविद्यालयों में शैक्षणिक सत्र 2020-21 के बी.एस.सी. कृषि (आनर्स) तथा बी.एस.सी. उद्यानिकी (आनर्स) पाठ्यक्रमों के प्रथम वर्ष में कक्षा 12वीं के अर्हकारी अंकों (अ) विज्ञान समूह में (रसायनस, भौतिकी, गणित एवं जीव विज्ञान) (ब) कृषि समूह में (कृषि के लिए उपयोगी विज्ञान एवं गणित के तत्व, फसल उत्पादन एवं उद्यान शास्त्र तथा पशुपालन एवं कुक्कुट पालन के तत्व) विषयों के कुल प्राप्तांकों (मेरिट) के आधार पर आॅनलाइन काउंसलिंग प्रक्रिया द्वारा प्रवेश दिया जाएगा। प्रवेश के इच्छुक सभी विद्यार्थियों को 12 अगस्त से 10 सितम्बर, 2020 के पूर्व पंजीयन कराना अनिवार्य होगा। 12वीं की परीक्षा में उत्तीर्ण सभी अभ्यर्थी जिनका कोई भी ग्रेड हो आॅनलाइन पंजीयन करा सकते हैं। 10 सितम्बर, 2020 तक आॅनलाइन काउंसलिंग हेतु पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थी महाविद्यालयों में प्रवेश के पात्र नहीं होंगे अर्थात उक्त तिथि तक आॅनलाइन पंजीयन न करने वाले अभ्यर्थियों को महाविद्यालयों में दाखिला नहीं मिल सकेगा। आॅनलाइन काउंसलिंग हेतु आवेदन प्रक्रिया में बी.एस.सी. कृषि एव बी.एस.सी. उद्यानिकी पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु अबतक कुल 12 हजार 700 विद्यार्थियों ने पंजीयन कराया है। इसी प्रकार बी.टेक कृषि अभियांत्रिकी एवं बी.टेक. खाद्य प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु कुल 1004 विद्यार्थियों ने पंजीयन कराया है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में 12वीं की अर्हकारी अंकों (मेरिट) के आधार पर प्रवेश हेतु आवेदन करने एवं आॅनलाइन काउंसलिंग के समस्त चरणों में शामिल होने के लिए अभ्यर्थियों को केवल एक ही बार पंजीयन करना होगा। पंजीयन हेतु निर्धारित तिथि 12 अगस्त से 10 सितम्बर, 2020 के मध्य पंजीयन कराना आवश्यक होगा। 10 सितम्बर के पश्चात पंजीयन की सुविधा नहीं दी जाएगी। पंजीयन एवं आवेदन वेबसाईट http://www.igkvmis.cg.nic.in पर जाकर किया जा सकता है। पंजीयन के पश्चात समस्त पंजीकृत अभ्यर्थियों को 12वीं की अर्हकारी अंकों (मेरिट) के आधार पर आॅनलाइन काउंसलिंग द्वारा निर्धारित दिनांक पर सीटों का आबंटन किया जाएगा। महाविद्यालय प्रशासन द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि आॅनलाइन काउंसलिंग मंे महाविद्यालयों की सूची अल्फाबेटिक क्रम में दी गई है और अभ्यार्थी अपनी पसंद के अनुरूप महाविद्यालयों का विकल्प भर सकते हैं।
आॅनलाइन काउंसलिंग के प्रथम चरण के तहत अभ्यर्थियों द्वारा 12 अगस्त से 10 सितम्बर, 2020 के मध्य आॅनलाइन पंजीयन, फीस जमा कर दस्तावेज अपलोड किये जा सकेंगे। बैंक से शुल्क किसी कारणवश वापिस हो जाने की स्थिति में अभ्यर्थियों को 11 से 12 सितम्बर, 2020 तक पुनः भुगतान करने की सुविधा दी जायेगी। आॅनलाइन काउंसलिंग हेतु पंजीकृत समस्त अभ्यर्थियों की प्रोविजनल मेरिट लिस्ट 13 सितम्बर, 2020 को जारी की जाएगी। विश्वविद्यालय द्वारा जारी प्रोविजनल मेरिट लिस्ट के आधार पर अभ्यर्थियों को प्रदेश में स्थित विभिन्न शासकीय कृषि, उद्यानिकी, कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों एवं कृषि विज्ञान केन्द्रों में मूल दस्तावेजों के साथ उपस्थित होकर दस्तावेजों का परीक्षण एवं सत्यापन कराना होगा। दस्तावेजों के सत्यापन उपरान्त संशोधित मेरिट लिस्ट 22 सितम्बर, 2020 को वेबसाइट पर प्रकाशित की जाएगी। विश्वविद्यालय द्वारा जारी संशोधित मेरिट पर 22 से 24 सितम्बर, 2020 के मध्यम आॅनलाइन दावा-आपत्ति अभ्यर्थियों द्वारा किया जा सकेगा। दावा-आपत्ति के निराकरण पश्चात अंतिम मेरिट लिस्ट का प्रकाशन 26 सितम्बर को किया जाएगा। 28 सितम्बर, 2020 को सीट एवं महाविद्यालय का आबंटन किया जाएगा। 29 सितम्बर से 2 अक्टूबर, 2020 (रात्रि 11ः59 बजे तक) अभ्यर्थी आबंटित प्रोविजनल सीट को सुरक्षित करने हेतु आॅनलाइन फीस जमा कर सकेंगे।
अभ्यर्थी यदि किसी कारणवश सीट आबंटन के पश्चात फीस जमा न करने के कारण सीट सुरक्षित नहीं कर पाता है और वह द्वितीय चरण की काउंसलिंग में शामिल होना चाहता है तो वह 29 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2020 (रात्रि 11ः59 बजे तक) आॅनलाइन आवेदन कर सकता है। वे अभ्यर्थी जो शुल्क भुगतान करने के पश्चात सीट निरस्त करना चाहते हैं और आगामी चरण की काउंसलिंग से बाहर निकलना चाहते है वे 29 सितम्बर से 3 अक्टूबर के मध्य (Seat withdrawal) का आॅनलाइन आवदेन भार सकते हैं। महाविद्यालयों में रिक्त सीटों हेतु द्वितीय चरण की काउंसलिंग 5 अक्टूबर, 2020 को तथा माॅपअप/कन्वर्जन काउंसलिंग 17 से 23 अक्टूबर, 2020 (प्रातः 11 बजे से शाम 5 बजे तक) आयोजित की जायेगी। निजी महाविद्यालयों में प्रबंधन कोटे की सीटों पर प्रवेश हेतु इच्छुक अभ्यर्थी जिन्होंने प्रवेश हेतु पूर्व में आवेदन किया है और वे प्रबंधन कोटे के अंतर्गत प्रवेश प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें पुनः आॅनलाइन आवेदन 27 से 31 अक्टूबर, 2020 के मध्य करना अनिवार्य होगा। ऐसे अभ्यर्थी जिन्होने पूर्व में आवेदन नहीं किया है और वे प्रबंधन कोटे के अंतर्गत प्रवेश प्राप्त करना चाहते हैं तो वे भी इसी तिथि में आॅनलाइन आवेदन कर सकते हैं।

साभार

(संजय नैयर)
सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी

सूचना – स्नातकोत्तर एवं पी.एच.डी. पाठ्यक्रमों में प्रवेश 5 सितंबर से

पिछली उपाधि के प्राप्तांकों के आधार पर मिलेगा दाखिला

रायपुर, 29 अगस्त 2020। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में स्नाकोत्तर एवं पी.एच.डी. पाठ्यक्रमों में दाखिले की प्रक्रिया 5 सितंबर, 2020 से प्रारंभ की जाएगी। कोविड-19 संक्रमण को ध्यान में रखते हुए इन पाठ्यक्रमों में बिना प्रवेश परीक्षा के पिछली उपाधि के प्राप्तांकों के आधार पर सीधे दाखिला दिया जाएगा। इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश के इच्छुक तथा निर्धारित अर्हताप्राप्त विद्यार्थी इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की वेबसाइट http://www.igkvmis.cg.nic.in पर 5 सितंबर, 2020 से 30 सितंबर, 2020 के मध्य आॅनलाइन आवेदन कर सकते हैं। प्रवेश के संबंध में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा निर्धारित आरक्षण नियम लागू होंगे।
उल्लेखनीय है कि कोविड-19 संक्रमण के कारण इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित महाविद्यालयों में स्नातकोत्तर एवं पी.एच.डी. पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु इस वर्ष संयुक्त पात्रता परीक्षा का आयोजन नहीं किया जा रहा है। इन पाठ्यक्रमों में पिछली उपाधि के प्राप्तांकों (मेरिट) के आधार पर सीधे प्रवेश दिया जाएगा। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में सस्य विज्ञान (एग्रोनाॅमी), कृषि अर्थशास्त्र, कृषि विस्तार (एग्रीकल्चर एक्सटेंशन), कृषि मौसम विज्ञान, कृषि सूक्ष्म जीव विज्ञान, कृषि सांख्यिकी, कीट विज्ञान, आनुवाशिकी एवं पादप प्रजनन, प्लान्ट माॅलिक्यूलर बायोलाॅजी एण्ड बायोटेक्नोलाॅजी, पौध रोग विज्ञान, पादप कायिकी (प्लान्ट फिजियोलाॅजी), मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन, वानिकी, पुष्प विज्ञान एवं भू-दृश्यावली, फल विज्ञान, सब्जी विज्ञान विषयों में एम.एस.सी. एवं एग्री बिजनेस मैनेजमेन्ट में एम.बी.ए. तथा एग्रीकल्चरल प्रोसेसिंग एण्ड फूड इंजिनियरिंग, फाॅर्म मशीनरी एण्ड पावर इंजिनियरिंग और स्वाइल एण्ड वाटर इंजिनियरिंग विषयों में एम.टेक. उपाधि पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया जाएगा। इन द्विवर्षीय पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु निर्धारित अर्हता संबंधित स्नातक उपाधि (बी.एस.सी. कृषि, बी.एस.सी. उद्यानिकी तथा बी.टेक. कृषि अभियांत्रिकी, 10$2$4 सिस्टम) में न्यूनतम 6.00 ओ.जी.पी.ए. निर्धारित की गई है। इसी प्रकार उपरोक्त विषयों में पी.एच.डी. पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु स्नातकोत्तर उपाधि (एम.एस.सी. कृषि, एम.एस.सी. उद्यानिकी, एम.एस.सी. वानिकी, एम.बी.ए. कृषि व्यवसाय प्रबंध और एम.टेक. कृषि अभियांत्रिकी) में न्यूनतम 3.00/4.00 अथवा 6.50/10.00 ओ.जी.पी.ए. अथवा 65 प्रतिशत अंक होना अनिवार्य है। इन पाठ्यक्रमों के प्रवेश हेतु छत्तीसगढ़ के मूलनिवासी ही आवेदन कर सकते हैं। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से स्नातक अथवा स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियांे के लिए मूलनिवास प्रमाण पत्र की बाध्यता नहीं होगी। पी.एच.डी. पाठ्यक्रम में सेवाकालीन विद्यार्थियों के लिए मूलनिवास प्रमाण पत्र की बाध्यता नहीं होगी। शैक्षणिक सत्र 2020-21 से पी.एच.डी. पाठ्यक्रम में सेल्फ फायनेन्स सीट्स श्रेणी के अंतर्गत भी प्रवेश दिया जाएगा। इस श्रेणी के तहत कृषि महाविद्यालय, रायपुर में कृषि, उद्यानिकी एवं कृषि अभियांत्रिक संकायों मंे मेरिट के आधार पर प्रवेश दिया जाएगा और इस श्रेणी में प्रवेश हेतु आरक्षण लागू नहीं होगा।

साभार

(संजय नैयर)
सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी

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