सूचना- कृषि महाविद्यालयों में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा 7-8 सितंबर को

रायपुर, 24 अगस्त 2020। भारत सरकार के गृह मंत्रालय विभाग द्वारा कोविड-19 महामारीकाल के दौरान विद्यार्थियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए विभिन्न शिक्षण संस्थानों में प्रवेश हेतु राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन का निर्णय लिया गया है। गृह मंत्रालय द्वारा यह निर्णय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्राप्त प्रस्ताव पर तथा विभिन्न राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की सहमति के बाद लिया गया है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाएं सितम्बर माह से प्रारंभ की जाएंगी। इसी परिपेक्ष्य में कृषि महाविद्यालयों में स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा (ए.आई.ई.ई.ए.) – 2020 का आयोजन 07 से 08 सितम्बर, 2020 को किया जाएगा। इस प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के इच्छुक अभ्यर्थी वेबसाइट icar.nta.nic.in पर आॅनलाईन आवेदन कर सकते हैं। इस परीक्षा के माध्यम से छात्र देश के किसी भी कृषि विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु पात्रता प्राप्त कर सकते हैं, इस हेतु प्रत्येक विश्वविद्यालय में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित होती है। इस परीक्षा में सम्मिलित होने वाले अभ्यर्थी परीक्षा सेे संबंधित आधिकारिक वेबसाईट पर परीक्षा की तारीख से लगभग 15 दिन पहले प्रवेश पत्र, रोल नंबर, केन्द्र, तिथि, पाली एवं समय डाउनलोड कर सकेंगे। अभ्यर्थी और उनके अभिभावक नवीनतम अपडेट के लिए संबंधित परीक्षा की वेबसाईट अथवा राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की वेबसाईट http://www.nta.ac.in पर निरंतर निरीक्षण करते रहंे। इस संबंध में अधिक जानकारी अथवा किसी अन्य स्पष्टीकरण के लिए संबंधित ईमेल आईडी icar@nta.ac.in या 8287471852, 8178359845, 9650173668, 9599676953 एवं 888235680 पर भी संपर्क कर सकते हैं।

साभार

(संजय नैयर)
सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी

गौठानों में हुआ वर्मी खाद बनाने का प्रशिक्षण


फिंगेश्वर – विकासखण्ड के गौठान ग्राम कसेरूडीह,सहसपुर, बासीन ,कोपरा , सेंदर रावड़ में कृषि विज्ञान केन्द्र जिला गरियाबंद एवं कृषि विभाग द्वारा गौठानों में कार्यरत् महिला समूहों को वर्मी कंपोस्ट निर्माण का प्रशिक्षण दिया गया। गौरतलब है कि अंचल में लगातार हो रहे, रसायनिक दवाओं और उर्वरकों के अंधाधुंध छिडकाव से भूमि की दशा काफी बिगडती चली जा रही है एवं कृषकों को सही उपज प्राप्त नहीं हो पा रही है पर्यावरण को भी काफी हानि हो रही है, जो कि एक गंभीर समस्या का विषय है।

इस परिपेक्ष्य में सुराजी गांव योजना (नरवा गरवा,घुरवा बाडी) अंतर्गत बने गौठानों में महिला समूहों को आत्मा योजनांतर्गत कृषि विज्ञान केन्द्र गरियाबंद के वैज्ञानिक ने वर्मी खाद निर्माण की विधि बताई। प्रवीण कुमार जमरे कृषि वैज्ञानिक ने बताया कि केंचुआ खाद एक उच्च गुणवत्ता युक्त खाद है जिसमें हर प्रकार के पोषक तत्व मौजूद होते है जो कि पौधों के लिये अत्यंत लाभकारी है।

बी.आर.साहू वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी फिंगेश्वर ने बताया कि कोविड-19 के संक्रमण के दौरान वर्मी खाद कृषकों के लिये अत्यंत उपयोगी होगी एवं कम कीमत पर किसानों को अपने ग्राम में ही उपलब्ध होगा।
उक्त कार्यक्रमों में कृ.वि.अधिकारी खिलेश्वर साहू ,केश कुमार साहू ग्रा.कृ.वि.अधिकारी हेमंत ध्रुव, उज्जवल शर्मा, शहजाद हुसैन, हरिशंकर सुमेर उपस्थित थे।

किसानो का पैसा बचायेगी ये “खाद”

मटका खाद

पिछले कुछ दशकों से देखा गया है कि रसायनिक दवाओं के अंधाधुंध छिड़काव के कारण हमारी जमीन बंजर तो हो ही रही है अपितु खेत की मिट्टी का पी एच वैल्यू भी कम होता जा रहा है मिट्टी अम्लीय होती जा रही है। जिसे उपजाऊ बनाने के लिए भांति-भांति प्रकार के रसायनों का छिड़काव खेतो पर किया जा रहा है, जिसके कारण मानव स्वास्थ्य को काफी बुरा प्रभाव पड़ रहा है और कई घातक बीमारियों को हम आमंत्रित भी कर रहे है। इस समस्या के निराकरण हेतु पिछले कई लेखों के माध्यम से जैविक विधियों से खाद, कीटनाशक, हार्मोन्स,काढ़ो के बारे में बताया गया है जिसे किसान भाइयों ने काफी पसंद भी किया है।

इस तारतम्य में आज की कड़ी में हम बताएंगे “मटका खाद’ के बारे में जिसे किसान भाई आसानी से केवल 5 से 7 दिवस में ही तैयार कर अपने खेत पर छिड़काव कर सकता है,और जो खाद खरीदने में जो लागत आती है उसे कम कर सकते है

                       
आवश्यक सामग्री:-


■ देशी गाय का 10  लीटर गौमूत्र ,

■ 10 किलोग्राम ताजा गोबर,

 ■ 01 किलोग्राम  गुड 

 ■01 किलो चने का बेसन

■ 1/2 किलोग्राम मिट्टी

मटका खाद बनाने की विधि:-

 सभी को मिलाकर 1 बड़े मटके में भरकर 5-7 दिन तक सडाएं इससे उत्तम जीवाणु कल्चर तैयार होता है। मटका खाद को 200 लीटर पानी में घोलकर किसी भी फसल में गीली या नमीयुक्त जमीन में फसलों की कतारों के बीच में अच्छी तरह से प्रति एकड़ छिडकाव करें . हर 15 दिन बाद इस क्रिया को दोहराएं।इस तरह फसल भी अच्छी होगी , पैदावार भी बढ़ेगी,जमीन भी सुधरेगी और किसी भी तरह के खाद की आवश्यकता नहीं पड़ेगी . इस तरह से किसान आत्मनिर्भर होकर बाजार मुक्त खेती कर सकता है और जहरमुक्त , रसायन मुक्त स्वादिष्ट और पौष्टिक फसल तैयार कर सकता है।


ऐसे उपयोग करे:- 

इस मटका खाद को सिंचाई जल के साथ सीधे भूमि उप अथवा टपक (ड्रिप) सिंचाई से भी दिया जा सकता है (1 मटका प्रति एकड़) एक मटका खाद को 400 लीटर पानी में अच्छे से घोलकर इस विलयन को पौधे के पास जमीन पर देने से अच्छे परिणाम मिलते है. यदि इसी विलयन को सूती कपड़े से छानकर फसलों पर छिड़कते है तो अधिक फूल व फल लगते है।


किन फसलों पर करे प्रयोग:-

मटका खाद का प्रयोग सभी प्रकार के फसलों पर किया जा सकता है।


सावधानियां

 मटका खाद का उपयोग करने के बाद कम से कम 15 दिवस तक किसी रसायनिक दवाओं का खेत मे छिड़काव ना करे।

किसान भाई श्री अनिल चौहरिया जी के वीडियो के माध्यम से सीखे की मटका खाद कैसे बनाया जाता है।


 विनम्र निवेदन

कम से कम किसान भाई एक एकड़ में इस विधि से खाद बनाकर जरूर अपनी फसल पर प्रयोग करे निश्चित ही लाभ मिलेगा और हम जैविक खेती की ओर अग्रसर रहेंगे।

तकनीक प्रचारक

बायो से मरा या केमिकल से मरी हुई इल्ली को देखकर पहचाने

विगत कुछ वर्षों से जैविक खेती का चलन काफी बढ़ गया है जो कि पर्यावरण व मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी आवश्यक भी है परंतु आज बाजारों में जैविक उत्पाद के नाम से कई ऐसे उत्पादो को किसान भइयो को मुहैय्या कराया जा रहा है जो कि रसायनिक है इसके प्रति किसान भाइयों को जागरूक रहने की आवश्यकता है ।

आज की कड़ी में किसान भाइयों को डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक बताएंगे कि किस तरह इल्लियों पर जैविक कीटनाशक का प्रभाव पड़ता है और किस तरह रसायनिक दवाओं का प्रभाव पड़ता है।


नीचे प्रदर्शित चित्रों के माध्यम से किसान भाई स्वयं जांच कर सकते है कि उन्होंने जिन उत्पादों का प्रयोग अपनी फसल पर किया है वह जैविक है या रसायनिक

बायो से मरी या केमिकल से “प्रभावित इल्ली देखकर पहचान आसान”

साभार

डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर

वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक

राजकुमारी सिदार

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर

कीट नियंत्रण – एक सस्ता सा ” कार्ड” जो तना छेदक, पत्ती लपेटक जैसे जिद्दी कीटों का करे खात्मा।


आधुनिक खेती आज काफी मंहगी हो गयी है किसान भाइयों ने फसलों का उत्पादन तो बढ़ा लिया है परंतु साथ ही साथ मंहगे कीटनाशकों का प्रयोग कर कृषि लागत को भी काफी बढ़ा लिया है।हमारा उधेश्य यह है कि कृषि लागत कम हो जाये और किसान भाइयों को अधिक उत्पादन प्राप्त हो।

आज की कड़ी में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक बताएंगे ट्राइकोग्रामा कार्ड के बारे जिसके प्रयोग से फसलों में लगने वाले तना छेदक, पत्ती लपेटक कीटो का प्रबंधन किया जा सकता है। आइए तो जानते है आखिर है क्या ये ” ट्राइकोग्रामा कार्ड”

ट्राइकोग्रामा कार्ड

“ट्राइकोग्रामा कार्ड”
ट्राइकोग्रामा परजीवी कार्ड की कीमत काफी कम होती है, जिसकी प्रति कार्ड कीमत 150 रुपए तक होती है जिसमे चार स्ट्रिप होती हैं और हर स्ट्रिप में 18 से 20 हजार अंडे होते हैं। कीट नियंत्रण की यह विधि काफी कारगर होने के साथ-साथ पर्यावरण के भी बहुत अनुकूल होती है। इस ट्राइकोग्रामा विधि किसान की लागत तो कम होती ही है, साथ ही साथ खेतों में पड़ने वाले रासायनिक जहर से भी मुक्ति दिलाती है।

ट्राइकोग्रामा कार्ड में होते है मित्र कीट ततैया के अंडे


यह गहरे रंग का अत्यन्त छोटा ततैया कीट होता है जो
कि लेपिडोप्टेरा कुल के लगभग 200 प्रकार के हानिकारक धान, सूर्यमुखी, कपास, फूलों और सब्जियों में हानिकारक तना छेदक,फल भेदक, पत्ती मोड़क कीटों का जैविक विधि से विनाश करता है।


नियंत्रण विधि

मादा ट्राईकोग्रामा फसल को क्षति पहुंचाने वाले कीटों के अण्डे में अपने अण्डे देती है। बाद में इन अण्डों से छोटे डिम्ब (लार्वा) निकलते हैं, जो कि हानिकारक कीटों के अण्डों के भागों को खा जाते हैं। अंत में इन पोषित अण्डों से व्यस्क ट्राईकोग्रामा ततैया निकलता है। एक ट्राईकोग्रामा ततैया हानिकारक कीटों के 100
कीटों को मार देता है।

इस ततैया की लम्बाई 0.4 से 0.7मिमी. होती है तथा इसका जीवनचक्र निम्न प्रकार है:
■अंडा देने की अवधि 16-24घण्टे
■लार्वा अवधि 2-3 दिन
■प्यूपा पूर्व अवधि  2 दिन
■प्यूपा अवधि   2-3दिन
■कुल अवधि 9-12 दिन

प्रयोग विधि
जैसे ही आपको हानिकारक कीटों के अण्डे दिखाई दें, तुरन्त ही ट्राईकोग्रामा कार्ड को छोटे-छोटे टुकड़ों में फाड़ लें, साथ ही इन टुकड़ों की संख्या को बराबर खेत में विभिन्न वर्गों में विभक्त कर लें।खेत के प्रत्येक वर्ग के बीचों बीच पौधे की पत्तियों को जोड़ कर इन टुकड़ों को लगा देना चाहिए।

ट्राईकोग्रामा कार्ड से व्यस्क कीट प्रायः सुबह के समय निकलते हैं और स्वतः ही पूरे खेत में फैलकर हानिकारक कीटों के अण्डों को खोजकर नष्ट कर देते हैं। परिणामों से पता चला है कि एक ट्राईकोग्रामा अपने चारों ओर लगभग 100 मीटर के घेरे में शत्रु कीट के अण्डों को खाकर नष्ट कर देता है।

यहां है उपलब्ध

जैविक नियंत्रण प्रयोगशाला

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़

ये भी है मित्रकीट

साभार

डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर

(वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक)

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़

कृषि क्षेत्र में कैरियर बनाने वाले 12th पास विद्यार्थियों का इंतजार समाप्त

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर से मान्यता प्राप्त सभी शासकीय एवं प्रायवेट कॉलेजों में सत्र 2020-21 में एडमिशन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है। इस वर्ष के पूर्व तक इन कोर्स में एडमिशन के लिए व्यापम प्रवेश परीक्षा लेता था।

किंतु इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण प्रवेश परीक्षा स्थगित कर दी गई है. इस वर्ष B.Sc.(Agri)/B.Sc.(Horticulture) कोर्स में 12th के (फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स/बायलॉजी) के अंकों के मेरिट के आधार पर एडमिशन होंगे। एडमिशन का ऑनलाइन प्रोसीजर, एडमिशन रूल्स, फीस इत्यादि सभी जानकारी के लिए विश्वविद्यालय की यह वेबसाइट विजिट करें।

http://www.igkvmis.cg.nic.in

स्त्रोत

श्री संजय नैयर

सूचना एवम जनसम्पर्क अधिकारी

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर (छ. ग.)

कीट प्रबंधन-इल्लियों से आजादी दिलाएगा ये सस्ता कीटनाशक।

कीटो के प्रबंधन के लिए केवल रसायनिक कीटनाशक ही काम नही आते कुछ कीटनाशक किसान भाई बिना किसी खर्च के अपने घरों पर ही बना सकते है, और अपनी फसलों को कीट मुक्त रख सकते है। उनमें से एक है मिर्च और लहसुन से बना ये जैविक कीटनाशक।

इस कीटनाशक से लगभग सभी प्रकार की इल्लियों का प्रबंधन किया जा सकता है, और यह पूर्णतः जैविक विधि से तैयार होता है। यह विधि काफी कारगर है। आज की कड़ी में हम बताएंगे कि किसान भाई किस तरह इस कीटनाशक को बना सकते है।


आवश्यक सामग्री

■500 ग्राम मिर्च
■500 ग्राम लहसुन
■20लीटर पानी
■1 गिलास
■1 स्प्रेयर

■1 मिट्टी का घड़ा

मिर्ची व लहसुन का मिश्रण तैयार करने की विधि
• 500 ग्राम मिर्ची डंठल सहित कूटकर डाले।
•500 ग्राम लहसुन कूट कर डाले।
•दोनो को अलग-अलग कूटकर डाले।
• 20 लीटर पानी में घोलकर छान ले |
• एक ग्लास एक स्प्रेयर मे डालकर एक एकड मे स्प्रे करे।

यदि इल्ली बडी है या कीट का प्रकोप बहुत ज्यादा हो तब क्या करें।

ऐसी स्थिति में इस मिश्रण में तांबे का टुकडा डालकर एक बार उबाले व उबालने के बाद मिट्टी के घड़े मे भरकर कपडे से बाधकर 21 दिन तक गोबर के ढेर में गाढ कर रखे।


उपयोग मात्रा
एक पम्प में 100 मिलीलीटर डालकर छिडकाव करे।

किन फसलों में करेगा काम
यह कीटनाशक सभी प्रकार के फसलों पर लगने वाले इल्लियों के नियंत्रण हेतु कारगर है।


सेल्फ लाइफ
3 माह तक इसे भंडारित कर रखा जा सकता है।

सावधानियां

◆लहसुन की साफ कलियां उपयोग में लावे

◆मिर्च सड़े गले ना हो।

◆इस कीटनाशक का प्रयोग प्रातः काल एवं शाम के समय ही करे।

सब्जी की खेती से मुकेश बने मिनी राइस मिल मालिक

करेले ने घोली जीवन में मिठास

15 लोगों को दे रहे हैं नियमित रोजगार

रायगढ़, के बरमकेला विकासखण्ड के नावापाली गांव के किसान है श्री मुकेश चौधरी जो सब्जियों की खेती से ना केवल अपने लिए अच्छी आमदनी सृजित कर रहे बल्कि 15 और लोगों को नियमित रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने अपनी लगन और मेहनत के साथ उद्यानिकी और कृषि विभाग से मिले मार्गदर्शन और वैज्ञानिक पद्धतियों के प्रयोग को अपनी सफलता का कारण बताया।

किसान मुकेश चौधरी ने बताया कि लगभग 10 वर्ष पूर्व उद्यानिकी विभाग के सहायक संचालक श्री पटेल ने उनके खेत का दौरा कर कृषि के प्रति ललक को देखते हुए ड्रिप सिंचाई विधि से खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी प्रेरणा से 2 एकड़ में सब्जी लगाकर शुरुआत की। आमदनी बढऩे पर 6 माह बाद ही शेष 8 एकड़ में ड्रिप सिंचाई पद्धति को लगवा लिया। इसके साथ ही उन्होंने भूमि की उर्वरता को बनाये रखने और अधिक पैदावार लेने फसल चक्रण को अपनाया, जिसमे वो एक और द्विबीज पत्रीय फसलों को बारी-बारी लगाते हैं। वो बताते हैं कि रायगढ़ जिले के अलावा वो कोरबा, जांजगीर, चाम्पा, सक्ती तथा ओडि़सा के सीमावर्ती इलाकों में भी सब्जियों की आपूर्ति करते हैं। ऐसे में उन्हें सालाना 7 से 8 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा होता है। इसके साथ ही वो 15 लोगों को नियमित रोजगार भी उपलब्ध करवा रहे हैं। अभी उन्होंने 2 एकड़ में करेले की फसल उगायी थी, जिससे उन्हें अच्छा खासा लाभ हुआ है। कृषि से हुई आमदनी से उन्होंने एक मिनी राइस मिल लिया है जिससे भी वो अतिरिक्त आमदनी ले रहे हैं।

इसके साथ ही श्री चौधरी सरकार की अहम योजना नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी को भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण मानते हैं। उन्होंने तो व्यक्तिगत स्तर पर इसका क्रियान्वयन भी शुरू कर दिया है। अपने घर के पीछे उन्होंने जलाशय के लिए एक छोटा तालाब खुदवाया है। घर में बाड़ी बनाकर उसमें आम, नींबू, कटहल, अमरूद और घरेलू उपयोग के लिए सब्जी भी उगा रहे हैं। घर में ही वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण भी उनके द्वारा किया जाता है। बाकी पशुधन की उचित देखभाल भी वो कर रहे हैं।

साभार

माननीय कृषि मंत्री श्री रविन्द्र चौबे जी के फेसबुक वॉल से

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