उपलब्धि- एक कृषि स्नातक ने बनाया ऐसा जैविक खाद जिससे किसान भाई कम पानी मे भी ले सकेंगे अधिक उपज

तहसील धमधा जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ के कृषि स्नातक योगेश सोनकर के स्टार्टअपने एसोचैम स्टार्टअप लॉन्च पैडकॉम्पिटीशन के फाइनल राउंड में जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है। इसका फाइनल राउंड अक्टूबर-नवंबर में गुजरात या दिल्ली में होगा। कोरोना संक्रमण के खतरे की वजह से डेट और स्थान तय नहीं किया गया है। फाइनलिस्ट चुनने के लिए है।

योगेश सोनकर

जोनल लेवल कॉम्पिटीशन में लगभग 100 स्टार्टअप को पीछे छोड़कर योगेश के स्टार्टअप ने फाइनलमें जगह बनाई। फाइनल राउंड में लगभग 15 स्टार्टअप ही शामिल होंगे।कॉम्पिटीशन में इन्वेस्टर भी शामिल होंगे। विनर्स को बिजनेस बढ़ाने के लिए डेढ़ करोड़ तक की फंडिंग मिल सकती हैं। योगेश ने किसानों के लिए ऐसी खाद बनाई है, जिससे कम पानी में भी उत्पादन किया जा सकता है। खाद को उन्होंने अर्थ एलिक्सिर नाम दिया है। फूट साइंस से एमएससी करने वाले योगेश ने दावा किया कि ये खाद डालने के बाद 50 प्रतिशत कम पानी में भी ज्यादा उत्पादन ले सकते हैं। लगातार तीन महीने खाद डालकर बंजर जमीन को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है।

योगेश ने बताया, मैंने किसानों को अक्सर पानी की समस्या से जूझते देखा है। 2016 में कम पानी में ज्यादा उत्पादन देने वाली खाद बनाने की दिशा में काम शुरू किया। जर्मनी और चीन जैसे देशों के रिसर्च पेपर भी पढ़े। तीन साल की मेहनत के बाद पोटेशियम बेस्ड सैलुलोस और माइक्रोन्यूट्रेन के इस्तेमाल से खाद तैयार की। इसके लिए कई एक्सपेरिमेंट भी किए। ये खेतों में पानी रोकने के साथ उर्वरक क्षमता बढ़ाती है। योगेश पिछले एक साल से खाद की विक्री कर रहे हैं। अब तक देशभर के 10 हजार से ज्यादा किसान इस खाद का इस्तेमाल कर चुके हैं।

क्या है अर्थ elixir:- अर्थ elixir पोटेशियम अधारित गैर विषैले सेलुलोस है जो अपने वजन से 200 से 300 गुना तक पानी को अवशोषित और बनाए रखने में सक्षम है और साथ ही साथ पौधों के जरूरी तत्व की प्राप्ति कर उनके उत्पादन में वृद्धि के लिए सहायता प्रदान करता है रोगों कीटों से लड़ने के लिए पौधों में प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी करता है साथ ही उसका उपयोग सरल व प्रभावी है यह गर्म जलवायु में खेती को विकसित करने के लिए बनाया गया है जैसे अत्यधिक गर्मी, सूखा, ठंडा एवं शुष्क, मरुस्थल, खराब मिट्टी इत्यादि। दिन प्रतिदिन पानी की बजाए अर्थ एलिक्सिर युक्त मृदा को केवल प्रति सप्ताह एक बार पानी की आवश्यकता होती है जिससे समय और पानी की बचत होती है।

अर्थ एलिक्सिर के फायदे हैं.?

1.मिट्टी की जल प्रतिधारण क्षमता बढ़ाते हैं।प्रभावी ढंग से सिंचाई को कम कर देता है।
2.पानी में पोषक तत्वों को बह जाने से रोकता है।
3.वाष्पीकरण दर कम कर पानी की कमी को रोकता है।
4.फुलने एवं सिकुड़ने की क्रिया के कारण मिट्टी को हिलाकर उत्सर्जन बढ़ाता है एवं मिट्टी के भौतिक गुणों में सुधार करता है
5.जड़ों से चिपककर केवल जड़ क्षेत्र में ही पानी और पोषक तत्व प्रदान करके पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं
6.मिट्टी में पानी के बह जाने को रोकता है
7.शुष्क क्षेत्रों में पौधे की वृद्धि को बढ़ाता है
8.सूखे और भू-जल प्रदूषण से लड़कर पर्यावरण की रक्षा करता है।
9.ठंड के समय जड़ की सुरक्षा करता है।
10.70 से 80% तक उर्वरक के उपयोग को कम करता है

11.पौधों में उत्पादन को बढ़ाता है।

12.C:N अनुपात को बैलेंस करता है

अर्थ एलिक्सिर कैसे काम करता है

अर्थी एलिक्सिर क्रिस्टल या पाउडर रूप में आता है जो पानी या अन्य तरल पदार्थ के संपर्क में आने पर जेलीफाइट हो जाता है इन कणो को मिट्टी में सूक्ष्म जलाशयों के रूप में देखा जा सकता है । अपने वजन से लगभग 300 से 400 पानी अवशोषित करने की क्षमता के साथ ही पानी को अंदर रखता है और भंडारण करता है। इन जलाशयों में से पानी ऑस्मोटिक दबाव अंतर के कारण आवश्यकतानुसार जड़ तक पहुंच जाता है। शुष्क क्षेत्रों में, रेतीली मिट्टी में अर्थ एलिक्सिर का उपयोग पानी की होल्डिंग क्षमता और बढ़ता है जो पौधों की गुणवत्ता में काफी सुधार करता है अर्थ एलिक्सिर मिट्टी के माध्यम से पानी की मिट्टी पारगम्यता, घनत्व, संरचना, बनावट और वाष्पीकरण दर को प्रभावित करता है उत्कृष्ट जल अवशोषण गुणवत्ता वाले अर्थ एलिक्सिर कृषि क्षेत्रों के लिए एक असाधारण रूप से सहायक और पर्यावरण अनुकूल वस्तु है इसका उपयोग खेतों और वानिकी सेवाओं के लिए किया जा सकता है घर और बगीचे के लिए कम पानी में पौधों की विकास दर को बढ़ाता है।
यह जल अवशोषण पानी के जलाशय के रूप में कार्य करता है और केवल आवश्यकता के समय ही संरक्षित संसाधन का उपयोग करता है । जिससे बेहतर कृषि में उपज मिलती है अर्थ एलिक्सिर पानी को अवशोषित और बनाए रखने के लिए एक अद्वितीय तंत्र का उपयोग करता है एवं जब फसल की मांग होती है तभी यह अपना पानी निर्वाहन करता है, अन्यथा यह अपने नबी स्तर को नहीं खोता।

यहां है उपलब्ध

श्री हेमन्त ग्राम मुरमुंदा

मो नम्बर +91 70670 03973

जैविक खेती-फसलों के लिए टीके का काम करता है जैव उर्वरक

सभी प्रकार के पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए मुख्यतः 17 तत्वों की आवश्यकता होती है। जिनमें नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश अति आवश्यक तथा प्रमुख पोषण तत्व है। यह पौधे में तीन प्रकार से उपलब्ध होती है।

  • रासायनिक खाद द्वारा
  • गोबर की खाद/ कम्पोस्ट द्वारा
  • छिडकाव का उपयुक्त समय मघ्य अगस्त से मघ्य सित्मबर हैा
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं फास्फोरस घुलनशील जीवाणुओं द्वारा

भूमि मात्र एक भौतिक माध्यम नहीं है बल्कि यह एक जीवित क्रियाशील तन्त्र है। इसमें सूक्ष्मजीवी वैक्टिरिया, फफूंदी, शैवाल, प्रोटोजोआ आदि पाये जाते हैं इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव वायुमण्डल में स्वतंत्र रूप से पायी जाने वाली 78 प्रतिशत नत्रजन जिन्हें पौधे सीधे उपयोग करने में अक्षम होते हैं, को अमोनिया एवं नाइट्रेट तथा फास्फोरस को उपलब्ध अवस्था में बदल देते हैं। जैव उर्वरक इन्हीं सूक्ष्म जीवों का पीट, लिग्नाइट या कोयले के चूर्ण में मिश्रण है जो पौधों को नत्रजन एवं फास्फोरस आदि की उपलब्धता बढ़ाता है। जैव उर्वरक पौधों के लिए वृद्धि कारक पदार्थ भी देते हैं तथा पर्यावरण को स्वच्छ रखने में सहायक हैं। भूमि, जल एवं वायु को प्रदूषित किये बिना कृषि उत्पादन स्तर में स्थायित्व लाते हैं इन्हें जैव कल्चर, जीवाणु खाद, टीका अथवा इनाकुलेन्ट भी कहते हैं।

जानिए कितने प्रकार के होते है जैव उर्वरक

  1. राइजोबियम कल्चर
  2. एजोटोबैक्टर कल्चर
  3. एजोस्पाइरिलम कल्चर
  4. नीलहरित शैवाल
  5. फास्फेटिक कल्चर
  6. अजोला फर्न
  7. माइकोराइजा

1. क्या है राइजोबियम कल्चर:

यह एक सहजीवी जीवाणु है जो पौधो की जडों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके उसे पौधों के लिए उपलब्ध कराती है! यह खाद दलहनी फसलों में प्रयोग की जा सकती है तथा यह फसल विशिष्ट होती है, अर्थातअलग-अलग फसल के लिये अलग-अलग प्रकार का राइजोबियम जीवाणु खाद का प्रयोग होता है। राइजोबियम जीवाणु खाद से बीज उपचार करने पर ये जीवाणु खाद से बीज पर चिपक जाते हैं। बीज अंकुरण पर ये जीवाणु जड़ के मूलरोम द्वारा पौधों की जड़ों में प्रवेश कर जड़ों पर ग्रन्थियों का निर्माण करते हैं।

फसल विशिष्ट पर प्रयोग की जाने वाली राइजोबियम कल्चर:

दलहनी फसलें:मूँग, उर्द, अरहर, चना, मटर, मसूर; मटर; लोबिया; राजमा; मेथी इत्यादि।

तिलहनी फसलें: मूँगफली, सोयाबीन। अन्य फसलें: बरसीम, ग्वार आदि।

ऐसे करे प्रयोग
200 ग्राम राइजोबियम से 10-12 किग्रा० बीज उपचारित कर सकते हैं। एक पैकेट को खोले तथा 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर लगभग 300-400 मि० लीटर पानी में डालकर अच्छी प्रकार घोल बना लें। बीजों को एक साफ सतह पर एत्रित कर जीवाणु खाद के घोल को बीजों पर धीरे-धीरे डालें, और बीजों को हाथ उलटते पलटते जाय जब तक कि सभी बीजों पर जीवाणु खाद की समान परत न बन जाये। इस क्रिया में ध्यान रखें कि बीजों पर लेप करते समय बीज के छिलके का नुकसान न होने पाये। उपचारित बीजों को साफ कागज या बोरी पर फैलाकर छाया में 10-15 मिनट सुखाये और उसके बाद तुरन्त बोयें।

2. क्या है एजोटोबैक्टर कल्चर:

यह जीवाणु खाद में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से रहने वाले जीवाणुओं

का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। यह जीवाणु खाद दलहनी फसलों को छोड क़र सभी फसलों पर उपयोग में लायी जा सकती है। इसका प्रयोग सब्जियों जैसे- टमाटर; बैंगन; मिर्च; आलू; गोभीवर्गीय सब्जियों मे किया जाता है!

3. क्या है एजोस्पाइरिलम कल्चर:

यह जीवाणु खाद भी मृदा में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से रहने

वाले जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। यह जीवाणु खाद धान, गन्ने;मिर्च; प्याज आदि फसल हेतु विशेष उपयोगी है।

4.क्या है नील हरित शैवाल खाद:

एक कोशिकीय सूक्ष्म नील हरित शैवाल नम मिट्टी तथा स्थिर पानी में स्वतन्त्र रूप से रहते हैं। धान के खेत का वातावरण नील हरित शैवाल के लिये सर्वथा उपयुक्त होता है। इसकी वृद्धि के लिये आवश्यक ताप, प्रकाश, नमी और पोषक तत्वों की मात्रा धान के खेत में विद्य़मान रहती है।

ऐसे करे प्रयोग

धान की रोपाई के 3-4 दिन बाद स्थिर पानी में 12.5 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से सूखे जैव उर्वरक का प्रयोग करें। इसे प्रयोग करने के पश्चात 4-5 दिन तक खेत में लगातार पानी भरा रहने दें। इसका प्रयोग कम से कम तीन वर्ष तक लगातार खेत में करें। इसके बाद इसे पुनः डालने की आवश्यकता नहीं होती। यदि धान में किसी खरपतवारनाशी का प्रयोग किया है तो इसका प्रयोग खरपतवारनाशी के प्रयोग के 3-4 दिन बाद ही करें।

5. क्या है फास्फेटिक कल्चर:

फास्फेटिक जीवाणु खाद भी स्वतन्त्रजीवी जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप में उत्पाद है। नत्रजन के बाद दूसरा महत्वपूर्ण पोषक तत्व फास्फोरस है, जिसे पौधे सर्वाधिक उपयोग में लाते हैं। फास्फेटिक उर्वरकों का लगभग एक-तिहाई भाग पौधे अपने उपयोग मे ला पाते है। शेष घुलनशील अवस्था में ही जमीन में ही पड़ा रह जाता है, जिसे पौधे स्वयं घुलनशील फास्फोरस को जीवाणुओं द्वारा घुलनशील अवस्था में बदल दिया जाता है तथा इसका प्रयोग सभी फसलों में किया जा सकता है।

ऐसे करे फास्फेटिक कल्चर का प्रयोग :

फास्फेटिक कल्चर या पी.एस.बी. कल्चर का प्रयोग रोपा लगाने के पूर्व धान पौध की जड़ों या बीज को बोने के पहले उपचारित किया जाता है। बीज उपचार हेतु 5-10 ग्राम कल्चर/किलोग्राम बीज दर से उपचारित करें। रोपा पद्धति में धान की जड़ों को धोने के बाद 300-400 ग्राम कल्चर के घोल में डुबाकर निथार लें, बाद में रोपाई करें। पी.एस.बी. कल्चर का भूमि में सीधे उपयोग की अपेक्षा बीजोपचार या जड़ों का उपचार अधिक लाभकारी होता है।

6. एजोला फर्न 
यह ठण्डे मौसम में स्थिर पानी के ऊपर तैरते हुए पाया जाता है जो दूर से देखने में हरे या लाल रंग की चटाईनुमा लगता है। इसकी पत्तियां बहुत छोटी तथा मोटी होती हैं। इन पत्तियों के नीचे छिद्रों में सहजीवी साइनो-वैक्टीरिया (एनावीना एजोली) पाया जाता है, जो नत्रजन स्थिरीकरण में सहायक है। यह जलमग्न धान के खेतों में बुवाई के एक सप्ताह बाद 10 कु०प्रति हे० की दर से उगाया जा सकता है जो दो किलोग्राम नत्रजन प्रति दिन की दर से स्थिर कर सकता है।

ऐसे करे प्रयोग

इसका प्रयोग कम्पोस्ट बनाने में अथवा 10 टन प्रति हे० की दर से हरी खाद के रूप में भूमि में मिलाकर किया जा सकता है। इसके प्रयोग से धान में खरपतवार कम पनपते हैं तथा नत्रजन के प्रयोग में 40-80 किलोग्राम तक बचत की जा सकती है।

7. माइकोराइजा 
इसमें फफूंदी का पौधें की जड़ों से सहजीवन होता है, जिसमें फफूंदी अपनी जड़ों से पोषक तत्वों को अवशोषित करती है और पौधों को इन तत्वों को तुरन्त उपलब्ध कराती है कवक इसके बदले भोजन पौधे लेता है। यह दो प्रकार का होता है

  • एक्टोमाइकोराइजा
  • इन्डोमाइकोराइजा

माइकोराइजा से लाभ

  • इसके प्रयोग से फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम एवं सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
  • इसके प्रयोग से वृद्धि वर्धक साइटोकाइनिन हार्मोन्स भी पौधों को उपलब्ध होता है।
  • इसके प्रयोग से पौधों हेतु जल की उपलब्धता बढ़ता है।

जैव उर्वरकों के उपयोग से ये है लाभ:

  1. इसके प्रयोग सं फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है।
  2. रासायनिक उवर्रक एवं विदशी मुद्रा की बचत होती है।
  3. ये हानिकारक या विषैले नही होते !
  4. मृदा को लगभग 25-30 कि.ग्रा./हे. नाइट्रोजन एवं 15-20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर फास्फोरस उपलब्ध कराना तथा मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशाओं में सुधार लाना।
  5. इनके प्रयोग से उपज में वृद्धि के अतिरिक्त गन्ने में शर्करा की, तिलहनी फसलों में तेल की तथा मक्का एवं आलू में स्टार्च की मात्रा में बढ़ोतरी होती है।
  6. विभिन्न फसलों में बीज उत्पादन कार्यक्रम द्वारा 15-20 प्रतिशत उपज में वृद्धि करना।
  7. किसानों को आर्थिक लाभ होता है।
  8. इनसे बीज उपचार करने से अंकुरण शीघ्र होता है तथा कल्लों की संख्या में वृद्धि होती है।
  • ये सावधानियाँ बरते:
  • जैव उर्वरक को हमेशा धूप या गर्मी से बचा कर रखना चाहिये। कल्चर पैकेट उपयोग के समय ही खोलना चाहिये। कल्चर द्वारा उपचारित बीज, पौध, मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण छाया में ही रखना चाहिये। कल्चर प्रयोग करते समय उस पर उत्पादन तिथि, उपयोग की अन्तिम तिथि, फसल का नाम आदि अवश्य लिखा देख लेना चाहिये। निश्चित फसल के लिये अनुमोदित कल्चर का उपयोग करना चाहिये।
  • किसान भाइयों को पी एस बी कल्चर, राइजोबियम कल्चर, एजोटोबैक्टर कल्चर कृषि विभाग के माध्यम से अनुदान पर प्रतिवर्ष रबी एवं खरीफ में उपलब्ध करवाया जाता है। निश्चित ही यह जानकरी किसान भाइयों के लिए बहुपयोगी होगी जिससे जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा।

केंचुआ खाद कैसे बनाए:

हमारी मिट्टी में रहनेवाला केंचुआ रोज अपने वजन के बराबर कचरा/मिट्टी खाता है और उससे मिट्टी की तरह दानेदार खाद बनाता है। भूमि की उपरी सतह पर रहनेवाले लंबे गहरे रंग के केंचुए जो अधिकतर बरसात के मौसम में दिखाई पड़ते हैं, खाद बनाने के लिए उपयुक्त हैं। भूमि की गहरी सतह में रहनेवाले सफेद मोटे केंचुए खाद बनाने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। केंचुए जमीन भी बनाते हैं जिससे मिट्टी में हवा का वहन होता है एवं मिट्टी की पानी धारण करने की क्षमता बढ़ती है। 20 फुट लंबे 1 बेड में करीब 1000 किलो तक सड़ा हुआ कचरा डाला जा सकता है। इसमें शुरूआत में 1000 केंचुए डालना आवश्यक है। रोज बेड में हल्का-हल्का पानी छिड़कना आवश्यक है ताकि 50 से 60 प्रतिशत नमी कायम रहे और बेड का तापमान 200 से 250 तक बना रहे। पूरे बेड को घास के पतले थर अथवा टाट की बोरियों से ढकना आवश्यक है ताकि सतह से नमी का वाष्पीकरण हो।

केंचुए हेतु अच्छा भोजन तैयार करना:

केंचुए गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सकते। उन्हें किसी भी प्रकार का कच्चा कचरा, कच्चा गोबर भोजन के रूप में नहीं दिया जा सकता। कच्चे गोबर के विघटन की प्रक्रिया के दौरान उससे गर्मी उत्पन्न हो सकती है जो केंचुओं के लिए हानिकारक होती है। अत: हमारे खेत में उत्पन्न होने वाले कचरे एवं गोबर को अलग से सड़ाना आवश्यक है। इसके लिए पेड़ की छांव में 5′ ग 5′ ग 5′ फुट के ढेर बनाए जा सकते हैं। इस ढेर में कचरे का हर एक थर 5-7 इंच तक मोटा हो सकता है। हर एक थर को गोबर पानी से भिगोकर उस पर दूसरा थर चढ़ा सकते हैं। यदि सूखा अथवा ताजा गोबर उपलब्ध है तो कचरे के थर के उपर गोबर का एक थर (2-3 इंच) चढ़ाया जा सकता है। इसे भी नम करना आवश्यक है। इस तरह परत के उपर परत चढ़ाकर 5 फुट तक उंचा ढेर बनाया जा सकता है। पूरे ढेर को काले प्लास्टिक से ढंकना अनिवार्य है, यदि काला प्लास्टिक न हो तो पूरे ढेर को अच्छी तरह मिट्टी से ढंककर गोबर से लिपाई कर दें। ढेर में 2-3 दिन के अंतर से हल्का-हल्का पानी छिड़कना जरूरी है, ताकि नमी बनी रहे। 15 दिन बाद इस ढेर को पलटना जरूरी है ताकि उसकी गर्मी निकल जाए। 30 दिन बाद ढेर को अच्छी तरह फैला दें। उसकी गर्मी निकलने के बाद उसे वर्मी बेड में केंचुओ के भोजन के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। इस तरह सड़ाया हुआ कचरा केंचुओ के लिये अच्छा भोजन है।

केंचुआ खाद तैयार करना:

केंचुए सूर्य का प्रकाश एवं अधिक तापमान सहन नहीं कर सकते इसलिए केंचुआ खाद के उत्पादन के लिए छायादार जगह का होना आवश्यक है। यदि पेड़ की छाया उपलब्ध न हो तो लकड़ी गाड़कर कच्चे घास फूस का शेड बनाया जा सकता है। यदि बड़े पैमाने में व्यावसायिक स्तर पर खाद का उत्पादन करना हो तो पक्का टिन अथवा सिमेंट की चद्दर का उपयोग करके शेड बनाया जा सकता है। केंचुआ खाद उत्पादन के लिए वर्मी बेड बनाए जाते हैं जिसकी लंबाई 20 फुट तक हो सकती है किन्तु चौड़ाई 4 फुट से अधिक एवं ऊंचाई 2 फुट से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस बेड में पहले नीचे की तरफ ईंट के टुकड़े (3”-4”) फिर उपर रेत (2”) एवं मिट्टी (3”) का थर दिया जाता है जिससे विपरीत परिस्थिति में केंचुए इस बेड के अंदर सुरक्षित रह सके। इस बेड के ऊपर 6 से 12 इंच तक पुराना सड़ा हुआ कचरा केंचुओ के भोजन के रूप में डाला जाता है।

40 से 50 दिन के बाद जब घास की परत अथवा टाट बोरी हटाने के बादन हल्की दानेदार खाद ऊपर दिखाई पड़े, तब खाद के बेड में पानी देना बंद कर देना चाहिए। ऊपर की खाद सूखने से केंचुए धीरे-धीरे अंदर चले जाएंगे। ऊपर की खाद के छोटे-छोटे ढेर बेड में ही बनाकर एक दिन वैसे ही रखना चाहिए। दूसरे दिन उस खाद को निकालकर बेड के नजदीक में उसका ढेर कर लें। खाली किए गए बेड में पुन: दूसरा कचरा जो केंचुओ के भोजन हेतु तैयार किया गया हो, डाल दें। खाद के ढेर के आसपास गोल घेरे में थोड़ा पुराना गोबर फैला दें और उसे गीला रखें। इसके ऊपर घास ढंक दें। इस प्रक्रिया में खाद में जो केचुएं रह गए हैं वे धीरे-धीरे गोबर में आ जाते हैं। इस तरह 2-3 दिन बाद खाद केंचुओं से मुक्त हो जाती है। बचे कचरे को केंचुओं सहित नजदीक के वर्मी बेड में डाल देते हैं। खाद को छानकर बोरी में फेंक कर दें अथवा छायादार जगह में एक गङ्ढे में एकत्र करें और इस गङ्ढे को ढककर रखें ताकि खाद में नमी बनी रहे। इस प्रकार एक बेड से करीब 500 से 600 किलो केंचुआ खाद 30-40 दिन में प्राप्त होती है।

केंचुओं के दुश्मन:

केंचुआ हमें अच्छी खाद प्रदान करता है। केंचुओं द्वारा मिट्टी में लगातार उपर- नीचे आवागमन से मिट्टी सछिद्र बनती है जिससे उसमें हवा का वहन अच्छा होता है एवं मिट्टी की पानी धारण क्षमता बढ़ती है। मिट्टी में केंचुओ की उपस्थिति मिट्टी को उपजाऊ बनाती है। इसलिए केंचुओं को किसान का मित्र कहा जाता है। किन्तु किसान मित्र केचुओं के कुछ प्राकृतिक दुश्मन भी हैं। केंचुओं के प्राकृतिक दुश्मन इस प्रकार हैं। (1) लाल चींटी (2) मुर्गी (3) मेढक (4) सांप (5) गिरगिट एवं (6) कुछ मिट्टी में रहने वाले कीड़े अथवा मांसभक्षी जीव (जो केंचुओं की तरह ही होते हैं मगर केंचुओं को खाते हैं। इन सबसे बचने के लिए केंचुओं को नर्सरी की जमीन के ऊपर के स्थान पर रखना चाहिए। वर्मी बेड को अच्छी तरह पहले घास से या फिर हल्के कांटों से ढ़कना चाहिए।

केंचुआ खाद के शेड के चारों तरफ नाली खोदकर उसमें पानी भर देने से चींटीयों से रक्षा होती है। शेड के चारों ओर कांटेदार बाड़ लगाने से मुर्गियां अंदर नहीं आ सकेंगी। समय-समय पर वर्मी बेड का परीक्षण करना आवश्यक है ताकि हमें यह जानकारी मिले कि किसी दुश्मन की वजह से केंचुओं का नुकसान तो नहीं हो रहा है। लाल चींटीयों से बचाने के लिए वर्मी बेड में नीचे के थर पर राख का छिड़काव किया जाता है। यदि वर्मी बेड में चीटीयां हो गई हों तब 20 लीटर पानी में 100 ग्राम मिर्च पाउडर, 100 ग्राम हल्दी पाउडर, 100 ग्राम नमक एवं थोड़ा साबुन डालकर उसका हल्का-हल्का छिड़काव वर्मी बेड में किए जाने से चींटीयां भाग जाती हैं। यदि रसोईघर के कचरे से वर्मी कम्पोस्ट बना रहे हों तो वर्मी कम्पोस्ट इकाई को कम से कम जमीन से 2 फुट उपर रखना चाहिए ताकि उसमें चींटीयां नहीं जा पाएं। रसोईघर के कचरे के साथ पके हुए भोजन की जूठन न डाले। इसकी वजह से चींटीयां आती हैं। यदि वर्मी बेड में चीटीयां हो गई हों तो बेड के किनारे-किनारे गोमुत्र में पानी मिलाकर छिड़कने से भी चींटीयां भाग जाती हैं।

केंचुआ खाद के गुण:

इस तरह बनाए गए केंचुआ खाद में न सिर्फ नाइट्रोजन, पोटैशियम एवं फास्फोरस होता है वरन सभी 16 प्रकार के सूक्ष्म पोषक द्रव्य उपस्थित होते हैं। इसके साथ ही इसमें सेंद्रीय पदार्थ एवं उपयोगी जीवाणु होते हैं। इस खाद को जमीन में डालने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति एवं सजीव शक्ति बढ़ती है। 2-3 वर्षों तक केंचुआ खाद जमीन में डालने पर भूमि पूरी तरह उपजाऊ हो जाएगी एवं किसी भी तरह की रासायनिक खाद को डालने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके साथ ही कीटों का प्रकोप कम हो जाएगा जिससे रासायनिक कीटनाशक की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

केंचुआ खाद के उपयोग की मात्रा:

  1. पौधे के एक गमले के लिए जिसमें 8 से 10 किलो मिट्टी डाली गई हो, 100 से 200 ग्राम केंचुआ खाद पर्याप्त है। केंचुआ खाद हर 3 महीने के बाद यदि आवश्यकता हो तो पुन: डाली जा सकती है।
  2. एक पेड़ में 1 से 10 किलो तक केंचुआ खाद डाली जा सकती है। खाद की मात्रा पेड़ के आकार अथवा उम्र के अनुसार बढ़ेगी।
  3. एक एकड़ के लिए कम से कम पहले वर्ष 2000 किलो खाद डालना आवश्यक है। उसके बाद अगले वर्ष में सिर्फ 1000 किलो खाद डालने से भी अच्छे परिणाम आएंगे। कम्पोस्ट खाद डालते समय उसमें कम से कम 15 से 20 प्रतिशत नमी होना आवश्यक है ताकि उसकी जीवाणु शक्ति सक्रिय रहे। केंचुआ खाद के साथ रासायनिक खाद का प्रयोग कम से कम अथवा नहीं के बराबर करें। रासायनिक खाद के उपयोग से जैविक खाद की जीवाणु शक्ति का नुकसान होता है जिससे हमारी भूमि की उर्वरता बढ़ाने में इस खाद का उपयोग नहीं हो सकेगा। केंचुआ खाद उत्तम खाद है। यह हमारी भूमि के लिए ही नहीं वरन पेड़ पौधों व फसलों के लिए भी संपूर्ण भोजन है। इसके उपयोग से हमारी फसल स्वस्थ होगी, उसकी गुणवत्ता बढ़ेगी एवं किसान आत्मनिर्भर बनेंगे।

पुरस्कार-अगर आप कर रहे है उन्नत तकनीक से खेती तो कृषि विभाग देगा आपको पुरस्कार

एक्सटेंशन रिफार्म्स (आत्मा) योजनांतर्गत राज्य, जिला और विकासखण्ड तीनों स्तर के उन्नत कृषक पुरस्कार वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए आवेदन आमंत्रित किया गया है। इसके लिए आवेदन प्रस्तुत करने की तिथि 1 अगस्त से 31 अगस्त 2020 तक निर्धारित की गई है। यह पुरस्कार कृषि, उद्यानिकी, पशुपालन और मत्स्य पालन के क्षेत्र में चयनित कृषकों को राज्य स्तर पर 50 हजार, जिलों में 25 हजार और विकासखण्ड में 10 हजार रूपए पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।

संचालनालय कृषि से मिली जानकारी के अनुसार एक्सटेंशन रिफार्म (आत्मा) के तहत यह पुरस्कार राज्य स्तर पर धान के लिए 2, दलहन, तिलहन हेतु 2, उद्यानिकी के क्षेत्र में 2, पशुपालन और मत्स्य पालन के लिए 2-2 कृषकों का चयन किया जाएगा। चयनित कृषकों को प्रति कृषक 50 हजार रूपए एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाता है।जिला स्तर पर धान हेतु 2 दलहन-तिलहन के क्षेत्र में 2, उद्यानिकी के लिए 2 पशुपालन और मत्स्य पालन हेतु 2-2 चयनित कृषकों को प्रति कृषक 25 हजार रूपए एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।विकासखण्ड स्तर पर धान के लिए 1 दलहन-तिलहन 1, उद्यानिकी 1, पशुपालन और मत्स्य पालन के क्षेत्र में 1-1 चयनित कृषकों को प्रति कृषक 10 हजार रूपए एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जाएगा।आप  अपना आवेदन जिला स्तर पर कार्यालय उप संचालक कृषि या विकासखण्ड स्तर पर  वरिष्ठ कृषि विकास अधिकरी पर जमा कर सकते है।

आवेदन के साथ जमा करें ये दस्तावेज

1 पासपोर्ट साइज फोटो

2 ऋण पुस्तिका की फोटो कॉपी

3 आपके कार्य गतिविधियों के फोटोग्राफ

4.बैंक पासबुक की छायाप्रति

5.आधार कार्ड की छायाप्रति

आवेदन है इस वेबसाइट में उपलब्

http://agriportal.cg.nic.in
ये है आवेदन का विज्ञापन एवं करने शर्तें।


 

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प्रचारक

किसान कैसे बचे आकाशीय गरज चमक से जाने उपाय

गरज – चमक के दौरान बचाव हेतु योग्य कुछ बुनियादी Do’s (करें) और Don’ts ( करे)

किसान बन्धु जब खेत पर कार्य करते है तो प्रकृति के द्वारा बरसात के समय गरज चमक होती है अतः गाज मारने से कई बार मृत्यु तक हो जाती है इस कड़ी में किसानों और जनसमुदाय को आकाशीय बिजली से बचने के उपाय आप सभी से साझा कर रहे है

Do’s ( करे)

1.आप सड़क पर हैं, तो बिजली से बचने के लिए आश्रय लें! भवन आश्रय के लिए सर्वोत्तम हैं, लेकिन यदि कोई भवन उपलब्ध नहीं हैं, तो आप एक गुफा, खाई, या एक घाटी में सुरक्षा पा सकते हैं। पेड़ अच्छे कवर नहीं हैं! लम्बे पेड़ बिजली को आकर्षित करते हैं।

2.यदि आपको आश्रय नहीं मिल रहा है, तो क्षेत्र की सबसे ऊंची वस्तु से बचें। यदि केवल अलग-थलग पड़े हुए पेड़ पास हैं, तो आपकी सबसे अच्छी सुरक्षा खुले में रहना है, अलग-थलग पेड़ों से दुगुनी दूरी पर स्थित रहे क्योंकि पेड़ ऊंचे होते हैं।

3.आकाशीय बिजली रहते हुए या इनडोर या घर मे रहते हुये यदि आप गड़गड़ाहट सुनते हैं, तो जब तक बिल्कुल आवश्यक न हो, बाहर न जाएं। याद रखें, फ्लैश चमक और गड़गड़ाहट के बीच सेकंड की गिनती करके और 3 से विभाजित करके, आप स्ट्राइक से अपनी दूरी का अनुमान लगा सकते हैं (किमी में)।

4.Lightining safety में ऐसी किसी भी चीज़ से दूर रहें जो बिजली का संचालन कर सके। इसमें फायरप्लेस, रेडिएटर, स्टोव, धातु पाइप, सिंक और फोन शामिल हैं। जिनमे थंडरस्टॉर्म अर्थात गरज चमक की गतिविधि अधिकतम है।

5.पानी से बाहर निकलें। इसमें पानी पर उतरने वाली छोटी नावें शामिल हैं।क्योंकि जल विद्युत का सुचालक है।

6.जब आप विद्युत आवेश महसूस करते हैं- यदि आपके बाल खड़े हो जाते हैं या आपकी त्वचा में झुनझुनी होने लगती है, तो बिजली आपके ऊपर आ सकती है। अतः तुरंत जमीन पर गिर जाओ।

.. DON’TS ..क्या न करे

1.किसी भी प्लग-इन बिजली के उपकरणों जैसे हेअर ड्रायर, इलेक्ट्रिक टूथब्रश या इलेक्ट्रिक रेज़र का उपयोग न करें। यदि बिजली आपके घर पर हमला करती है, तो वे चार्ज को आपसे जोड़ सकते हैं।

2.तूफान के दौरान टेलीफोन का उपयोग न करें। बिजली बाहर टेलीफोन लाइनों को मार सकता है।

3.बाहर धातु की वस्तुओं का उपयोग न करें।

गरज चमक की आकाशीय अवस्था
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