चेतावनी-आगामी 5 दिन का मौसम ऐसा रहेगा किसान भाई कर लेंवे ये तैयारी

 श्री पी. आर. बोबडे कृषि मौसम वैज्ञानिक अगले पांच दिनों का मौसम पूर्वानुमान एवं समसामयिक सलाह (१२.०८.२०२० से १६.०८.२०२०) जारी की……. 

भारत मौसम विज्ञान विभाग, नई दिल्ली एवं रायपुर द्वारा जारी मौसम पूर्वानुमान के अनुसार- आगामी पांच दिनों में मध्यम से घने बादल छाए रह  सकते हैं तथा अधिकतर स्थानों पर हल्की बारिश  एवं कुछ जगहों पर हल्की से मध्यम बारिश होने की सम्भावना  हैं । अधिकतम और न्यूनतम तापमान क्रमशः २७ से २८°C और २४.० से २५.०°C  के मध्य  रह सकता है । सुबह हवा में ९५-९८ प्रतिशत तथा दोपहर में ८०-८५ प्रतिशत नमी रहने की संभावना है । आने वाले दिनो में हवा कि गति लगभग २-३ किलो मीटर प्रति घंटा रह सकती है ।

समसामयिक सलाह: 

१. खेतो में जल क्षमता के लिए फसल से खरपतवार की निंदाई का कार्य प्राथमिकता देकर करे   ।

 २. किसानों भाइयों को सलाह दी जाती है कि मक्का में  यूरिया डालने से पहले निराई / गुड़ाई करें । यदि तना छेदक द्वारा फसलों पर हमला हो, तो फ्यूराडान नामक कीटनाशक दवा का  10 – 15 दाने  डालें ।

३. वर्तमान में, विभिन्न खरीफ फसलों जैसे अरहर, मूंगफली, उरद, मूंग आदि फसलों में खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए निदाई-गुड़ाई आवश्यक है । निदाई-गुड़ाई के बाद, यूरिया को अपनी आवश्यकता के अनुसार डाले ।

४. किसान भाई धान रोपाई का कार्य १५ अगस्त तक पूर्ण करे । उसके बाद रोपाई कार्य न करे  अथवा एक स्थान पर ३-४ पौधें रोपें ।  रोपा किये गये खेतों में लगभग ५ से. मी. से अधिक पानी रोककर न रखें  |

५. यदि धान की रोपाई में देरी हो जाती है (३०-३५ दिनों से अधिक), तो ४ से ५ पौधों की रोपाई १५ सेमी (पंक्ति से पंक्ति) और १० सेमी (पौधे से पौधे) की दूरी पर रोपित करें । छिड़काव विधि से बोये गए ३०-३५ दिन के धान में, पर्याप्त नमी की उपलब्धता होने पर बियासी किया जाना चाहिए । 

६. टमाटर, बैगन, मिर्च, भिन्डी एवं अन्य सब्जी वाली फसल में निंदाई गुडाई करे । 

साभार

कृषि विज्ञान केंद्र

जिला कोरिया छत्तीसगढ़

वैज्ञानिक सलाह-धान में लगने वाले रोग ब्लाइट,शीथ रॉट, शीथ ब्लाइट,ब्लास्ट का प्रबंधन

चावल दुनिया की आधी आबादी का मुख्य भोजन है और इसकी खेती वैश्विक स्तर पर की जाती है। विश्व में धान लगभग 148 मिलियन हेक्टेयर भूमि में उगाया जाता है, जिसका लगभग 90 प्रतिशत एशियाई देशों में होता है। वहीँ देश में किसानों के लिए धान की फसल आय का प्रमुख स्त्रोत है, इसलिए यह जरूरी है की किसान धान की फसल का कम लागत में अधिक उत्पादन कर अधिक आय प्राप्त कर सकें ।

धान की फसल में इस समय ब्लाइट,शीथ रॉट, शीथ ब्लाइट, ब्लास्ट रोग लगने की संभावना अधिक है अतः आज की कड़ी में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर किसानों की समस्या को ध्यान में रखते हुए इन रोगों के लक्षण एवम प्रबंधन के उपाय बता रहे है जो कि निम्नानुसार है।

जीवाणु झुलसा


यह एक जीवाणुजनित रोग है। प्रारंभिक लक्षण बीज बुवाई या पौध रोपाई के लगभग 25 दिन बाद दिखाई देने लगते हैं। पत्तियों जीवाणु झुलसा के एक अथवा दोनों किनारों पर पीले रंग की लहरदार धारियां बन
जाती हैं व पत्ती सूख जाती हैं। इस रोग की तीव्रता कंसे की अवस्था से लेकर गभोट अवस्था तक अधिकतम होती है।

जीवाणु झुलसा

पर्णच्छंद याशीथ रॉट


यह रोग गभोट की अवस्था में दिखाई देता है। बालियां निकलने के समय कत्थई भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। बाली के अधिकांश दाने कत्थई रंग के एवं अंदर से खाली रह जाते हैं।

शीथ रॉट

शीथ ब्लाइट


यह रोग कंसे की अवस्था में तीव्रता से आता है। तने परअनियमित आकार के गहरे भूरे किनारे वाले धब्बे बनते हैं। धब्बों के बीच का भाग मटमैला हो जाता है। रोग खेत में पानी की सतहसे आरंभ होकर पौधे में ऊपर की ओर फैलता है।खेत में रोग के लक्षण छोट-छोटे भाग में बिखरे हुए दिखाई देते हैं। पत्तियां भूरे से कास्य रंग के धब्बों से ढंक जाती है व पत्तियां सूखने लगती है।

शीथ ब्लाइट

ब्लास्ट/ पत्तीझौंका


पत्तियों का कत्थई रंग के आंख के आकार के धब्बे बनते हैं।धब्बों के बीच का रंग राख के समान और धब्बे की परिधि गहरे भूरे रंग की होती है। धब्बों के आपस में मिलने से पूरी पत्ती झुलस जाती हैं। रोग का प्रकोप बालियों की गर्दन पर भी होता है, जिससे वे गर्दन भाग से पकने के पूर्व ही टूट जाती है।

ब्लास्ट

ब्लाइट,ब्लास्ट ,शीथ रॉट, शीथ ब्लाइट के उपचार के लिए किसान भाई प्रोपिकॉनाज़ोल 10 .7 % + ट्रायसायक्लाजोल 34.3 % SE ( COVER कवर ) 250 ml + स्ट्रेप्टोसायक्लीन 12 ग्राम SIL G सील जी 200 ml को प्रति  एकड़ के हिसाब से ।
500 ग्राम Root H को यूरिया+ पोटाश  की बराबर मात्रा को  कोटिंग करके जमीन में प्रति एकड़।

श्री अनिल चौहरिया जैविक कृषक के अनुसार जैविक नियंत्रण हेतु निम्न जैविक दवाओं का प्रयोग भी काफी कारगर है।

ताम्रयुक्त छास 5 लीटर/एकड़

या
■ स्यूडोमोनास 2 लीटर/एकड़


जरवानी छिपछिपा 2 से 3 सेंटीमीटर पानी का स्तर रखे।

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विशेष जैविक सलाह:

ताम्रयुक्त छास फफूंद जनित रोग और कुछ मात्रा में कीटनियंत्रक का भी काम करता है, इसमे 500-500 ग्राम लहसुन-मिर्च मिलाया दिया जाए तो छांछ से आंशिक नाइट्रोजन की पूर्ति, तांबा मिलने पर फफूँद नाशी और मिर्च-लहसुन मिलने पर कीट नियंत्रक का काम करता है।

साभार

डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर

(वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक)

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़

तकनीक प्रचारक

घन जीवामृत-किसान भाई अपने घर पर बना सकते है। “घनजीवामृत”

किसान भाइयों आज हमे घन जीवामृत से खेती करने की बहुत ही आवश्यकता है। क्योंकि हरितक्रांति के बाद से ही भारतीय खेती मे जिस प्रकार रसायनिक उर्वरको का आंख बंद कर के बड़ी भारी मात्रा मे प्रयोग हुआ है उसने हमारी भूमि की संरचना ही बदल कर रख दी है। आज बहुत ही तेजी से खेती योग्य भूमि बंजर भूमि में बदलती जा रही है। और लाखों करोड़ रुपया किसानों का रासायनिक उर्वरकों पर खर्च हो रहा है। खेतो मे लगातार रासायनिक उर्वको के प्रयोग से फसल की पैदावार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
अधिक खर्च और कम उत्पादन के कारण ही किसान भाई कर्ज से दबे हुए है। साथ ही हमारे खाने से होकर ये जहर हमारे स्वास्थ्य को भी खराब कर रहा है।
इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जैविक खेती के अंतर्गत किसानों के पास उपलब्ध संसाधनों से ही खेती करके अधिक पैदावार लेना है। जैसे रासायनिक उर्वरकों की जगह अधिक से अधिक जैविक खादों का प्रयोग करना। जिनमे कम्पोस्ट खाद, वर्मीकम्पोस्ट, जीवामृत,गोमूत्र आदि का प्रयोग करना है।
इस लेख में हम घन जीवामृत के बारे में जानकारी दे रहे है। जिसे किसान भाई कम लागत मे अपने ही घर पर बनाकर खेतो मे प्रयोग करके अधिक लाभ ले सकते है।

घन जीवामृत (एक एकड़ हेतु)
घनजीवामृत में सूक्ष्मजीव सुषुप्त अवस्था में रहते हैं। खेत में डालने पर ये जीव सक्रिय होकर फसल को पोषकतत्व उपलब्ध करवाते हैं।

■100 किलोग्राम गाय का गोबर
■ 1 किलोग्राम गुड/फलों की चटनी
■2 किलोग्राम बेसन (चना, उड़द, अरहर, मूंग)

■50 ग्राम मेड़ या जंगल की मिट्टी
■1 लीटर गौमूत्र


बनाने की विधि


■सर्वप्रथम 100 किलोग्राम गाय के गोबर को किसी पक्के फर्श व पोलीथीन पर फैलाएं।

■एक पात्र में बाद गुड या फलों की चटनी, बेसन एवं मेड़ या जंगल कीमिट्टी डालकर उसमे गौमूत्र मिलाये।

■घोल बनाकर घोल को गोबर के ऊपर छिडक कर फॉवड़ा से अच्छी तरह से मिला दें।

■इस सामग्री को 48 घंटे तक किसी छायादार स्थान पर एकत्र कर या थापीया बनाकर जूट के बोरे से ढक दें।

■48 घंटे बाद उसको छाए पर सुखाकर चूर्ण बनाकर भंडारण करें।

भण्डारण

इस घन जीवामृत का भण्डारण करके 6 माह तक प्रयोग कर सकते हैं। गोबर ताजा ही लें या फिर अधिकतम सात दिन तक पुराना गोबर का प्रयोग करें।गोमूत्र किसी धातु के बर्तन में न रखें।


उपयोग

एक बार खेत जुताई के बाद घनजीवामृत का छिड़काव कर खेत तैयार करें।

श्री रोहित साहू जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ के वीडियो से सीखे की कैसे बनाते है घन-जीवामृत

साभार

साकेत

सतत कृषि ज्ञान एवम शशक्तिकरण संस्था

वीडियो साभार

श्री रोहित साहू जिला दुर्ग छत्तीसगढ़

तकनीक प्रचारक

“हम कृषको तक तकनीक पहुंचाते हैं”

सामुदायिक बीजोत्पादन – किसान भाई स्वयं अपना बीज तैयार कर हो सकते है “आत्म निर्भर”

बीज किसी फैक्ट्री में नही किसान के खेत मे उगता है।

कृषि कार्य करने हेतु सबसे अहम बात होती है बीजो का चुनाव।आज का किसान हर वर्ष निजी संस्थाओं से सहकारी समितियों से खरीदकर खेती करता है जिससे खेती करने की लागत बढ़ जाती है अपितु सोचनीय विषय यह है कि बीज किसी कारखाने में नही किसान के खेत मे ही तैयार होता है।आज की कड़ी में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक बताएंगे कि किसान भाई कैसे अपना बीज स्वयं ही बना सकते है।
बीज बनाने से पहले हम जानेंगे कि बीज होता क्या है।
“पसुसुप्त भ्रूण” को बीज कहते है।
यदि इसे विस्तार से बताए तो ऐसा परिपक्व सुसुप्त भ्रूण जिसमें उसके प्रारंभिक पोषण के लिए भोजन सामग्री बीज पत्रों या एंडोस्पर्म के रूप में आवरण में हो और अनुकुल दशाओं में एक स्वस्थ पौधे को जन्म दे, बीज कहलाता है।

  1. केंद्रीय बीज (nucleus seed) – केंद्रीय बीज प्रजनक (वैज्ञानिक) द्वारा स्वयं तैयार किया जाता है। जो अनुवांशिक रूप से 100% शुद्ध होता है।
  2. प्रजनक बीज (breeder seed) – केंद्रीय बीज से प्रजनक बीज स्वयं प्रजनक (वैज्ञानिक) के देख रेख में तैयार किया जाता है। यह केन्द्रीय बीज की संतति होती है। यह बीज भौतिक एवं अनुवांशिक रूप से 100 शुद्ध होता है। प्रजनक बीज के बोरे में पीले रंग का टैग लगा होता है।
  3. आधार बीज (foundation seed) – इसका उत्पादन बीज प्रमाणीकरण संस्था की निगरानी में होता है। यह प्रजनक बीज की संतति होती है। आधार बीज के थैली पर प्रमाणीकरण संस्था का सफ़ेद रंग का टैग लगा होता है।
  4. प्रमाणित बीज (certified seed) – यह बीज आधार बीज से तैयार किया जाता है। अतः यह आधार बीज की संतति होती है। प्रमाणित बीज उत्पादन बीज प्रमाणीकरण संस्था की देख रेख में किया जाता है। यह भी भौतिक एवं अनुवांशिक रूप से शुद्ध होता है। इसके बोरे/थैली पर प्रमाणीकरण संस्था का नीले रंग का टैग लगा होता है। परगित फसलों में बीज दो पीढ़ी तक मानी किया जा सकता है।

प्रमाणित बीज का महत्व
प्रमाणित बीज अनुवांशिक एवं भौतिक रूप से शुद्ध होते है, तथा इन पौधों में एकरूपता, गुणों में समानता एवं पकने की अवधि एक पाई जाती है।
बीज की अंकुरण क्षमता मानकों के अनुरूप होती है।
बीज की जीवन क्षमता उत्तम होती है। तथा पुष्ट भरा एवं चमकदार होता है।
प्रमाणित बीज के उपयोग से सामान्य बीज की उपेक्षा उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है।

जानिए क्या है प्रमाणित बीज और किन मानकों से गुजरकर किसानों तक पहुंचता है।

ऐसा बीज जो भारत सरकार द्वारा निर्धारित भारतीय न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण मानकों की पालन करते हुए राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा प्रमाणित किये जाते हैं, वे प्रमाणित बीज कहलाते हैं।

केन्द्रक बीज, प्रजनक बीज, लेबल बीज, टेस्ट स्टाक बीज प्रमाणित नहीं होते बल्कि सभी वैधानिक रूप से लेबल बीज होते है।

प्रमाणित बीज की गुणवत्ता
प्रमाणित बीज तैयार करने में बीज की गुणवत्ता को निम्न प्रकार सुनिश्चित किया जाता हैं

1.अनुवांशिक शुद्धता – अनुवांशिक शुद्धता का अर्थ हैं, किस्म विकास के समय जनक प्रजनक द्वारा बताये गुणों वाले पौधों के अलावा एनी प्रजाति के बीज, खरपतवार, रोगी पौधों की छटाई करना और गुणों में बदलाव को रोकना हैं,यह कार्य बीज प्रमाणीकरण अधिकारी और बीज उत्पादकों द्वारा किया जाता है। अनुवांशिक शुद्धता निम्न क़दमों से सुनश्चित की जाती है –

2. कृषक का चुनाव – बीज उत्पादन में ऐसे कृषक का चुनाव करते हैं। जो कृषि ज्ञान और बीज उत्पादन की पृष्ठ भूमि का हो और ऐसा न हो कि कृषक की ना समझी के कारन बीज में किसी स्तर पर मिलावट हो जाएँ।
किस्म का चुनाव – प्रमाणित बीज तैयार करते समय ऐसी किस्म का चुनाव करते हैं जिसमें अधिकतम उत्पादन देने एवं अधिकतम रोगरोधी क्षमता हो। किस्म में स्थायित्व एक रूपता और विलक्षणता के लक्षण हो।

3. बीज का स्त्रोत – प्रमाणित बीज उत्पादन के लिए आधार बीज या प्रजनक बीज प्रयोग करते है और वह भी किसी विश्वविद्यालय या प्रमाणीकरण संस्था द्वारा तैयार किया गया हो। राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था प्रमाणित बीज उत्पादन का कार्यक्रम स्वीकार करते समय और निरक्षण के समय स्त्रोत की जांच करती है।
4. छटाईं – कृषक खड़ी फसल में दूसरी जाती के पौधे, खरपतवार, रोगी पौधों की छटाईं करता है। और बीज प्रमाणीकरण अधिकारी खड़ी फसल का निरिक्षण करता है और मानक की पुष्टि न होने पर निरस्त भी कर देता है।

5. बीज निकालना – बीज निकालने और गोदाम में लाने तक ध्यान रखा जाता है। ताकि बीज में किसी प्रकार मिलावट न हो। थ्रेशिंग की मशीन साफ़ हो और गोदामों में प्रत्येक किस्म का बीज अलग लगाते हैं, बोरियां (थैले) उलटे करके साफ़ भरे जाते हैं और हर बैग पर किस्म का नाम लिखा होता है।

6.आइसोलेशन – किस्मों में अवांछित परागण से मूल लक्षणों में परिवर्तन न आये उसके लिए प्रत्येक किस्म को निर्धारित आइसोलेशन (पृथकीकरण) अंतर पर लगाते है। अत: शुद्धता बनी रहती है जैसे बाजरा में 200 मी., अरहर में 250 मी.,भिन्डी में 250 मी. धान में 3 मी.आदि।

7. ग्रो आउट टेस्ट – बीज तैयार होने पर वितरण से पहले भी पुन: बीज को उगा कर देखा जाता है और चैक किया जाता है की किस्म के गुणों में कोई परिवर्तन तो नहीं आया है और शुद्ध बीज ही अगले सीजन में बीजाई के लिए वितरित किया जाता है।

किसान ससमुदायिक बीजोत्पादन कैसे करे।


एक क्लस्टर में लगभग 10 हेक्टेयर के किसानों का चयन करें।
■एक ही किस्म का धान बीज सभी किसान भाई साथ मे लगाए
■अनुवांशिक शुद्धता हेतु आइसोलेशन डिस्टेंस का ध्यान रखे।
■धान में निकलने वाली प्रथम बाली जो पककर तैयार होती है उसे अलग कर लेंवे।
■छत्तीसगढ़ में इसे “माई बीजहा” कहा जाता है यह बीज सबसे स्वस्थ बीज होता है इस बीज को किसान आने वाले समय मे बो सकते है

सावधानियां
ग्रो आउट टेस्ट:-
किसान भाई बीज बोने से पूर्व छोटी सी जगह पर एक मुट्ठी बीज उगाकर स्वयं अंकुरण की जांच कर लेंवे। ततपश्चात ही खेत पर बुवाई करे

नोट-हाइब्रिड बीजो से बीजोत्पादन नही किया जा सकता

साभार

डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर(वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक)इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालयरायपुर छत्तीसगढ़

तकनीक प्रचारकर्ता

“हम कृषकों तक तकनीक पहुंचाते हैं”

जैविक तरीको को अपनाकर किसान बचा सकते है अपनी फसल को कीटो से।

भारत में हरित क्रांति का मुख्य उद्देश्य देश को खाद्यान्न मामले में आत्मनिर्भर बनाना था, लेकिन इस बात की आशंका किसी को नहीं थी कि कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल न सिर्फ खेतों को बंजर बना देगा, बल्कि पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाएगा। क्योंकि देश के ज्यादातर
किसान परंपरागत कृषि से दूर होते जा रहे हैं। किसानों ने अधिक लालच के कारण कीटनाशकों के अत्यधिक व अनावश्यक मात्रा में प्रयोग से कृषि भूमि को बंजर बना दिया है। सरकार ने भी किसानों के हित में परंपरागत कृषि की ओर लौटने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना का शुभारंभ कर दिया है।


पक्षियों से कीट नियंत्रण :

मित्र पक्षियोंको आकर्षित करने के लिए खेत की मेड़ोंपर लकड़ी की खप्पचियां लगाएं। इस पर
बैठकर पक्षी आकर्षित होकर फसलों में लगे कीड़ों एवं लटों को चुन-चुन कर खा जाते हैं। मित्र पक्षी जैसे मैना, बटेर, बगुले आदि


परभक्षी एवं परजीवी कीटों से
नियंत्रण :

किसान लाभदायक मित्र कीट एवं जीवों का संरक्षण कर व इनको प्रोत्साहन देकर तथा इनके लार्वा का खेत में प्रयोग करके हानिकारक कीटो का बिना किसी कीटनाशकों के नियंत्रण किया जा सकता है। इनमें मेन्टिस, लेडी बर्ड बीटल, कोटेसिया, क्राइसोपरला, ट्राईकोग्रामा कीट, मकड़ी, झींगुर, चींटियां, ततैया, रोवर-फ्लाईं, रिडूविड, मड-वेस्प, ड्रेगन-फ्लाई एवं सिरफिड-पलाई आदि शामिल है।

नीम दवा :

नीम के सभी भागों में कीटनाशी तत्व
पाया जाता है। 5 किलो नीम की निबोली को अच्छी तरह सुखाकर बारीक कूट लें और 5 लीटर पानीमें इस पाउडर को 12 घंटे तक भिगो दें। इस घोलको मोटे कपड़े से छान लें। इस घोल में 100 लीटर पानी प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें। इनका प्रयोग कपास, तिलहन व टमाटर को हानि पहुंचाने वाले माइ, सफेद मक्खी, फुदका, कटुआ सुंडी तथा फल छेदक सुंडी पर प्रभावी होता है। अरण्डी व नीम से दीमक नियंत्रण: बुआई के एक माह पूर्व अरंडी की खली 500 किलो प्रति हेक्टेयर उपयोग कर या नीम तेल
4 लीटर सिंचाई के पानी के साथ देकर दीमक को नष्ट किया जा सकता है।


ट्राईकोग्रामा कीट :

यह बहुत छोटा अंड परजीवी कीट है जो पतंगों और तितलियों के अंडों में अपने अंडे देती है। ट्राईकोग्रामा परजीवी प्रकृति में पाया जाता है।

फेरोमोन ट्रेप:

फसल में 8 से 10 फेरोमोन ट्रेप एक-डेढ़ फीट ऊपर लगाएं। ये ट्रेप नर- मादा अथवा दोनों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं।


लाइट ट्रेप/प्रकाश पाश:

कीटों को प्रकाश की ओर आकर्षित करने के लिएखेत की मेड़ों पर प्रकाश पाश. या बल्ब या पैट्रोमेक्स लेप लगाकर जलाएं। उसके नीचे केरोसिन मिले 5 प्रतिशत पानी की परात रखें, ताकि रोशनी पर आकर्षित कीट मिट्टी के तेल मिले पानी में गिरकर नष्ट हो जाएं। इसे बारिश के मौसम में सितंबर अंत तक जारी रखें।

ट्रेपफसल या रक्षक फसल

कीड़ेअंडे देने व खाने के लिए कुछ पौधे/फसल
(हजारा आदि) की तरफ आकर्षित होते हैं। इन्हीं फसल/पौधों को ट्रेप फसल कहते हैं। टमाटर कीफसल के चारों तरफ गेंदे के पौधे लगाने से हरी सुंडी पहले गेंदे के पौधों पर दिखाई देती है। तुरंत गेंदे पर कीटनाशक का छिड़काव कर हरी सूंडी को खत्म करें।


एनपीवी छिड़कावः

हरी सुंडी (लट) के नियंत्रण केलिए एक हेक्टेयर में 250 एल.ई. एन.पी.वी
(न्यूक्लियर पॉली हैड्रोसिस वायरस) का घोल
छिड़कने से लटें 3-4 दिन में पौधों पर उल्टी
लटक कर मर जाती है। किसान ऐसी लटों को इकट्ठाकरके खुद एनपीवी तैयार कर सकता है।
बीटी छिड़कावः तरल बीटी (बेसीलस थूरिन्जेन्सिस)एक लीटर को 500-600 लीटर पानी मेंघोलकर प्रति हैक्टेयर छिड़काव करने से
फली छेदक लटें 1-3 दिन में मरने लग
जाती हैं।


ट्राइकोडर्मा :

ट्राइकोडर्माकल्चर 6 से 10 ग्राम प्रति किलो
बीज को उपचारित कर बोने से कवकजनित रोगों से फसलोंको बचाया जा सकता है।

 कृषि सलाह- मिर्च में लगे थ्रिप्स तो ये करे उपाय

मिर्च की फसल एक नगदी फसल है। सब्जी उत्पादक कृषक जो मिर्च की खेती करते है वे मुख्यतः थ्रिप्स कीट से परेशान रहते है थ्रिप्स मिर्च पर लगने वाले मुख्य कीट में से एक है।इस समस्या को देखते हुए आज की कड़ी में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर बताएंगे कि किस प्रकार थ्रिप्स कीट का प्रबंधन करे।

पौधों पर लक्षण

थ्रिप्स के प्रकोप के कारण मिर्च की पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ कर नाव का आकार धारण कर लेती है। मिर्च की फसल में थ्रिप्स व माइट का आक्रमण एक साथ हो जाये तो पत्तियां विचित्र रूप से मुड़ जाती हैं।


जैविक नियंत्रण उपाय
साथ मे लगाये अगस्त्य

सेसबानिया ग्रैंडिफ्लोरा (अगस्त्य) के साथ अंतर फसल करें जो थ्रिप्स कीटो की आबादी को नियंत्रित करती है। 


मिर्च+प्याज की खेती कभी न करे।

मिर्च और प्याज मिश्रित फसल नहीं उगायें दोनों फसलों पर थ्रिप्स का प्रकोप होता है।


करे नीम की खली का प्रयोग

रोपण के समय नीम खली @ 100 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से रोपण के समय और रोपाई के 30 दिन बाद डालें।प्रतिरोधी किस्मो का करे चयनथ्रिप्स सहनशील किस्में पूसा ज्वाला, फुले ज्योति का उपयोग करें।नीले स्टिकी ट्रैप्स का प्रयोग करे ।

थ्रिप्स की निगरानी के लिए नीले चिप चिपे कार्ड 1 वर्गमीटर में एक की दर से फसल केनोपी से 15 सेमी की ऊँचाई पर लगावें।
एक घरेलू उपचार

टार्च में प्रयोग होने वाले सेल को तोड़ ले उसका कार्बन निकाल लें और 15 लीटर पानी में 7 से 10 ग्राम कार्बन का चूरा मिलकर उस घोल का छिड़काव करें।

रासायनिक नियंत्रण

◆THAIMETHOXAM 12.6EC+LAMDACYHLOTRIN 9.5%
100 ml प्रति एकड़ एवम साथ मे SIL-G+5 ग्राम (सिंगल सुपर फास्फेट, राखड़) प्रति लीटर पानी दर से स्प्रे करे।

आवश्यक सावधानियां

◆ स्प्रे सुबह के समय करे साथ मे सोप सोलुशन अवश्य मिलाए । 

◆ स्प्रिंकलर से सिंचाई देने से इसके प्रकोप को कम किया जा सकता है। 

◆ बायो में वेर्टिसिल्लिम lacani का 1 लीटर या 2 kg प्रति एकड़ प्रभावी है।
◆ रासायनिक कीटनाशक के साथ नीम तेल अवश्य मिलाए

अनुभव जरूर साझा करें।

Disclaimer: The document has been compiled on the basis of available information for guidance and not for legal purposes.
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साभार

डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर(वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक)

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर छत्तीसगढ़

जैविक खेती-फसलों के लिए टीके का काम करता है जैव उर्वरक

सभी प्रकार के पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए मुख्यतः 17 तत्वों की आवश्यकता होती है। जिनमें नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश अति आवश्यक तथा प्रमुख पोषण तत्व है। यह पौधे में तीन प्रकार से उपलब्ध होती है।

  • रासायनिक खाद द्वारा
  • गोबर की खाद/ कम्पोस्ट द्वारा
  • छिडकाव का उपयुक्त समय मघ्य अगस्त से मघ्य सित्मबर हैा
  • नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं फास्फोरस घुलनशील जीवाणुओं द्वारा

भूमि मात्र एक भौतिक माध्यम नहीं है बल्कि यह एक जीवित क्रियाशील तन्त्र है। इसमें सूक्ष्मजीवी वैक्टिरिया, फफूंदी, शैवाल, प्रोटोजोआ आदि पाये जाते हैं इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव वायुमण्डल में स्वतंत्र रूप से पायी जाने वाली 78 प्रतिशत नत्रजन जिन्हें पौधे सीधे उपयोग करने में अक्षम होते हैं, को अमोनिया एवं नाइट्रेट तथा फास्फोरस को उपलब्ध अवस्था में बदल देते हैं। जैव उर्वरक इन्हीं सूक्ष्म जीवों का पीट, लिग्नाइट या कोयले के चूर्ण में मिश्रण है जो पौधों को नत्रजन एवं फास्फोरस आदि की उपलब्धता बढ़ाता है। जैव उर्वरक पौधों के लिए वृद्धि कारक पदार्थ भी देते हैं तथा पर्यावरण को स्वच्छ रखने में सहायक हैं। भूमि, जल एवं वायु को प्रदूषित किये बिना कृषि उत्पादन स्तर में स्थायित्व लाते हैं इन्हें जैव कल्चर, जीवाणु खाद, टीका अथवा इनाकुलेन्ट भी कहते हैं।

जानिए कितने प्रकार के होते है जैव उर्वरक

  1. राइजोबियम कल्चर
  2. एजोटोबैक्टर कल्चर
  3. एजोस्पाइरिलम कल्चर
  4. नीलहरित शैवाल
  5. फास्फेटिक कल्चर
  6. अजोला फर्न
  7. माइकोराइजा

1. क्या है राइजोबियम कल्चर:

यह एक सहजीवी जीवाणु है जो पौधो की जडों में वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके उसे पौधों के लिए उपलब्ध कराती है! यह खाद दलहनी फसलों में प्रयोग की जा सकती है तथा यह फसल विशिष्ट होती है, अर्थातअलग-अलग फसल के लिये अलग-अलग प्रकार का राइजोबियम जीवाणु खाद का प्रयोग होता है। राइजोबियम जीवाणु खाद से बीज उपचार करने पर ये जीवाणु खाद से बीज पर चिपक जाते हैं। बीज अंकुरण पर ये जीवाणु जड़ के मूलरोम द्वारा पौधों की जड़ों में प्रवेश कर जड़ों पर ग्रन्थियों का निर्माण करते हैं।

फसल विशिष्ट पर प्रयोग की जाने वाली राइजोबियम कल्चर:

दलहनी फसलें:मूँग, उर्द, अरहर, चना, मटर, मसूर; मटर; लोबिया; राजमा; मेथी इत्यादि।

तिलहनी फसलें: मूँगफली, सोयाबीन। अन्य फसलें: बरसीम, ग्वार आदि।

ऐसे करे प्रयोग
200 ग्राम राइजोबियम से 10-12 किग्रा० बीज उपचारित कर सकते हैं। एक पैकेट को खोले तथा 200 ग्राम राइजोबियम कल्चर लगभग 300-400 मि० लीटर पानी में डालकर अच्छी प्रकार घोल बना लें। बीजों को एक साफ सतह पर एत्रित कर जीवाणु खाद के घोल को बीजों पर धीरे-धीरे डालें, और बीजों को हाथ उलटते पलटते जाय जब तक कि सभी बीजों पर जीवाणु खाद की समान परत न बन जाये। इस क्रिया में ध्यान रखें कि बीजों पर लेप करते समय बीज के छिलके का नुकसान न होने पाये। उपचारित बीजों को साफ कागज या बोरी पर फैलाकर छाया में 10-15 मिनट सुखाये और उसके बाद तुरन्त बोयें।

2. क्या है एजोटोबैक्टर कल्चर:

यह जीवाणु खाद में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से रहने वाले जीवाणुओं

का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। यह जीवाणु खाद दलहनी फसलों को छोड क़र सभी फसलों पर उपयोग में लायी जा सकती है। इसका प्रयोग सब्जियों जैसे- टमाटर; बैंगन; मिर्च; आलू; गोभीवर्गीय सब्जियों मे किया जाता है!

3. क्या है एजोस्पाइरिलम कल्चर:

यह जीवाणु खाद भी मृदा में पौधों के जड़ क्षेत्र में स्वतन्त्र रूप से रहने

वाले जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप उत्पाद है, जो वायुमण्डल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। यह जीवाणु खाद धान, गन्ने;मिर्च; प्याज आदि फसल हेतु विशेष उपयोगी है।

4.क्या है नील हरित शैवाल खाद:

एक कोशिकीय सूक्ष्म नील हरित शैवाल नम मिट्टी तथा स्थिर पानी में स्वतन्त्र रूप से रहते हैं। धान के खेत का वातावरण नील हरित शैवाल के लिये सर्वथा उपयुक्त होता है। इसकी वृद्धि के लिये आवश्यक ताप, प्रकाश, नमी और पोषक तत्वों की मात्रा धान के खेत में विद्य़मान रहती है।

ऐसे करे प्रयोग

धान की रोपाई के 3-4 दिन बाद स्थिर पानी में 12.5 कि.ग्रा. प्रति हे. की दर से सूखे जैव उर्वरक का प्रयोग करें। इसे प्रयोग करने के पश्चात 4-5 दिन तक खेत में लगातार पानी भरा रहने दें। इसका प्रयोग कम से कम तीन वर्ष तक लगातार खेत में करें। इसके बाद इसे पुनः डालने की आवश्यकता नहीं होती। यदि धान में किसी खरपतवारनाशी का प्रयोग किया है तो इसका प्रयोग खरपतवारनाशी के प्रयोग के 3-4 दिन बाद ही करें।

5. क्या है फास्फेटिक कल्चर:

फास्फेटिक जीवाणु खाद भी स्वतन्त्रजीवी जीवाणुओं का एक नम चूर्ण रूप में उत्पाद है। नत्रजन के बाद दूसरा महत्वपूर्ण पोषक तत्व फास्फोरस है, जिसे पौधे सर्वाधिक उपयोग में लाते हैं। फास्फेटिक उर्वरकों का लगभग एक-तिहाई भाग पौधे अपने उपयोग मे ला पाते है। शेष घुलनशील अवस्था में ही जमीन में ही पड़ा रह जाता है, जिसे पौधे स्वयं घुलनशील फास्फोरस को जीवाणुओं द्वारा घुलनशील अवस्था में बदल दिया जाता है तथा इसका प्रयोग सभी फसलों में किया जा सकता है।

ऐसे करे फास्फेटिक कल्चर का प्रयोग :

फास्फेटिक कल्चर या पी.एस.बी. कल्चर का प्रयोग रोपा लगाने के पूर्व धान पौध की जड़ों या बीज को बोने के पहले उपचारित किया जाता है। बीज उपचार हेतु 5-10 ग्राम कल्चर/किलोग्राम बीज दर से उपचारित करें। रोपा पद्धति में धान की जड़ों को धोने के बाद 300-400 ग्राम कल्चर के घोल में डुबाकर निथार लें, बाद में रोपाई करें। पी.एस.बी. कल्चर का भूमि में सीधे उपयोग की अपेक्षा बीजोपचार या जड़ों का उपचार अधिक लाभकारी होता है।

6. एजोला फर्न 
यह ठण्डे मौसम में स्थिर पानी के ऊपर तैरते हुए पाया जाता है जो दूर से देखने में हरे या लाल रंग की चटाईनुमा लगता है। इसकी पत्तियां बहुत छोटी तथा मोटी होती हैं। इन पत्तियों के नीचे छिद्रों में सहजीवी साइनो-वैक्टीरिया (एनावीना एजोली) पाया जाता है, जो नत्रजन स्थिरीकरण में सहायक है। यह जलमग्न धान के खेतों में बुवाई के एक सप्ताह बाद 10 कु०प्रति हे० की दर से उगाया जा सकता है जो दो किलोग्राम नत्रजन प्रति दिन की दर से स्थिर कर सकता है।

ऐसे करे प्रयोग

इसका प्रयोग कम्पोस्ट बनाने में अथवा 10 टन प्रति हे० की दर से हरी खाद के रूप में भूमि में मिलाकर किया जा सकता है। इसके प्रयोग से धान में खरपतवार कम पनपते हैं तथा नत्रजन के प्रयोग में 40-80 किलोग्राम तक बचत की जा सकती है।

7. माइकोराइजा 
इसमें फफूंदी का पौधें की जड़ों से सहजीवन होता है, जिसमें फफूंदी अपनी जड़ों से पोषक तत्वों को अवशोषित करती है और पौधों को इन तत्वों को तुरन्त उपलब्ध कराती है कवक इसके बदले भोजन पौधे लेता है। यह दो प्रकार का होता है

  • एक्टोमाइकोराइजा
  • इन्डोमाइकोराइजा

माइकोराइजा से लाभ

  • इसके प्रयोग से फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम एवं सूक्ष्म तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है।
  • इसके प्रयोग से वृद्धि वर्धक साइटोकाइनिन हार्मोन्स भी पौधों को उपलब्ध होता है।
  • इसके प्रयोग से पौधों हेतु जल की उपलब्धता बढ़ता है।

जैव उर्वरकों के उपयोग से ये है लाभ:

  1. इसके प्रयोग सं फसलों की पैदावार में वृद्धि होती है।
  2. रासायनिक उवर्रक एवं विदशी मुद्रा की बचत होती है।
  3. ये हानिकारक या विषैले नही होते !
  4. मृदा को लगभग 25-30 कि.ग्रा./हे. नाइट्रोजन एवं 15-20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर फास्फोरस उपलब्ध कराना तथा मृदा की भौतिक एवं रासायनिक दशाओं में सुधार लाना।
  5. इनके प्रयोग से उपज में वृद्धि के अतिरिक्त गन्ने में शर्करा की, तिलहनी फसलों में तेल की तथा मक्का एवं आलू में स्टार्च की मात्रा में बढ़ोतरी होती है।
  6. विभिन्न फसलों में बीज उत्पादन कार्यक्रम द्वारा 15-20 प्रतिशत उपज में वृद्धि करना।
  7. किसानों को आर्थिक लाभ होता है।
  8. इनसे बीज उपचार करने से अंकुरण शीघ्र होता है तथा कल्लों की संख्या में वृद्धि होती है।
  • ये सावधानियाँ बरते:
  • जैव उर्वरक को हमेशा धूप या गर्मी से बचा कर रखना चाहिये। कल्चर पैकेट उपयोग के समय ही खोलना चाहिये। कल्चर द्वारा उपचारित बीज, पौध, मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण छाया में ही रखना चाहिये। कल्चर प्रयोग करते समय उस पर उत्पादन तिथि, उपयोग की अन्तिम तिथि, फसल का नाम आदि अवश्य लिखा देख लेना चाहिये। निश्चित फसल के लिये अनुमोदित कल्चर का उपयोग करना चाहिये।
  • किसान भाइयों को पी एस बी कल्चर, राइजोबियम कल्चर, एजोटोबैक्टर कल्चर कृषि विभाग के माध्यम से अनुदान पर प्रतिवर्ष रबी एवं खरीफ में उपलब्ध करवाया जाता है। निश्चित ही यह जानकरी किसान भाइयों के लिए बहुपयोगी होगी जिससे जैविक खेती को बढ़ावा मिलेगा।

औषधीय ज्ञान-जाने हरसिंगार के गुणों के बारे में।

हरसिंगार (Nyctanthes arbor – tristis)

नंदकिशोर प्रजापति

हरसिंगार एक पुष्प देने वाला वृक्ष है।इसे हमारे ग्रामीण अंचल में सियाली/सियारी कहकर पुकारते है,इसकी टहनियों से टोकरी बनाने का काम वर्षो से होता आया हैं। कुछ लोग इसे पारिजात भी कहते है, पर इसमे कई मतभेद भी हैं। हारसिंगार को शेफाली, शिउली आदि नामो से भी जाना जाता है


हरसिंगार का पेड़ 10 से 15 फीट तक ऊँचा हो जाता है।हारसिंगार पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसकी सबसे बड़ी पहचान है सफ़ेद फूल और केसरिया डंडी होती है। इसके फूल रात में खिलते है और सुबह सब झड जाते है
हारसिंगार अत्यंत लाभकारी ओषधि हैं, जो अनेक रोगों को दूर करने में सहायक है

साइटिका का सफल इलाज

एक पैर मे पंजे से लेकर कमर तक दर्द होना साइटिका या रिंगण बाय कहलाता है। प्रायः पैर के पंजे से लेकर कूल्हे तक दर्द होता है जो लगातार होता रहता है। मुख्य लक्षण यह है कि दर्द केवल एक पैर मे होता है,दर्द इतना अधिक होता है कि रोगी सो भी नहीं पाता।
हारसिंगार के 250 ग्राम कोमल पत्ते को कटे फटे न हों तोड़ लाएँ पत्ते को धो कर थोड़ा सा कूट ले या पीस ले।बहुत अधिक बारीक पीसने कि जरूरत नहीं है। लगभग एक लीटर पानी में धीमी आंच पर उबाले.. जब 700 ग्राम पानी बचे तब इसे छान कर बोतल में भर लीजिये,,व प्रतिदिन आधा कप खाली पेट लीजिये।कुछ ही दिनों में साइटिका में आराम मिल जाएगा, ध्यान रखे बसन्त ऋतु में इसके पत्रों का असर कुछ कम हो जाता हैं।


(नोट -काढ़े से 15 मिनट पहले और 1 घंटा बाद तक ठंडा पानी न पीए,दही लस्सी और आचार न खाएं..)

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